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रानाडे, गांधी और जिन्ना 245

शब्दों में दी है और ऐसा करने में उसने अपने पाठकों को इस बात की भी चेतावनी दी है कि इसकी व्याख्या करने में सच्चाई के विषय में उनके विचार हैं :

‘‘वह सच्चाई नहीं, जो स्वयं को सच्चा कहती है : ओह, बिल्कुल नहीं! वह वास्तव में अति तुच्छ बात है; एक छिछली, आत्म - श्लाघी, स्व - आरोपित सच्चाई जो बहुधा मुख्यतः अभिमान एवं अहंकार पूर्ण होती है। महापुरुष की सच्चाई इस प्रकार की होती है कि उसके विषय में वह कुछ बोल ही नहीं सकता, उसका उसे बोध ही नहीं होता। इसके विपरीत मेरा विचार है कि वह पाखंड से अधिक सचेत रहता है। महापुरुष तो कभी भी अपने को ईमानदार कहकर आत्म - प्रशंसा नहीं करता, वह उससे कोसों दूर रहता है; वह शायद स्वयं से भी यह नहीं पूछता कि क्या वह ऐसा है : बल्कि मैं तो यह करुंगा कि उसकी सच्चाई तो स्वयं उस पर भी निर्भर नहीं करती, वह सच्चाई का पल्ला छोड़ ही नहीं सकता।‘‘

लार्ड रोजबरी ने एक और कसौटी नेपोलियन के संबंध में प्रस्तुत की। नेपोलियन जितना महान जनरल था, उतना ही समान प्रशासक भी था। क्या नेपोलियन महान था? इस प्रश्न का उत्तर देते समय रोजवरी ने निम्नलिखित भाषा का प्रयोग किया :

‘‘यदि ‘महान‘ से अभिप्राय नैतिक और प्रतिभा संबंधी गुणों के समन्वय से है तो वह निश्चित रूप से महान नहीं है। परंतु वह असाधारण तथा सर्वोच्च होने के अर्थ में महान है। इसमें हमें कोई संदेह नहीं हो सकता। यदि महानता का अर्थ प्राकृतिक शक्ति, प्रधानता, मानवता से परे किसी मानवीयता से है, तब नेपोलियन निश्चय ही महान है। उस वर्णनातीत चिंगारी के अलावा जिसे हम प्रतिभा कहते हैं, वह बुद्धि तथा शक्ति के ऐसे समन्वय का प्रतीक है, जिसकी शायद किसी भी न तो बराबरी की गई और न ही कभी उसे लांघा गया।‘‘

एक तीसरी कसौटी है, जिसे दार्शनिकों ने बताया है या यदि और ठीक - ठाक कहें तो इसे लोगों ने बताया है, जो मानवीय कार्यव्यापार के दैवी - निर्देश में विश्वास करते हैं। महापुरुष कौन होता है, उसके विषय में उनकी अवधारणा अलग है। उनके विचारों को संक्षेप में रोजबरी ने इस प्रकार व्यक्त किया है - ‘‘महापुरुष विश्व में एक महान प्राकृतिक या अलौकिक शक्ति के रूप में अवतरित होता है। वह समाज की गंदगी की सफाई करता है तथा उसे सही मार्ग पर ले जाता है। वह शुद्धिकारक तथा संकटमोचक वरदान होता है। वह एक विराट कार्य में लगा होता है, जो अंशतः सकारात्मक तथा मुख्यतः नकारात्मक होता है, परंतु सबका संबंध सामाजिक पुनरुद्वार से होता है।

इनमें से सही व सच्ची कसौटी कौन सी है? मेरे विचार से सभी कसौटियां अपूर्ण हैं, कोई भी पूर्ण नहीं है। सच्चाई तो महापुरुष की कसौटी होनी ही चाहिए। कलेमेन्सो ने एक बार कहा था कि अधिकांश राजनेता दुष्ट व बदमाश होते हैं। राजनेता अनिवार्यतः, महापुरुष नहीं होते और जिन लोगों के अनुभव पर उसने अपना मत कायम किया, वे स्पष्टतः ऐसे लोग हैं, जिनमें सच्चाई का अभाव रहा है। फिर भी, कोई भी इस बात को