6. रानाडे, गांधी और जिन्ना - Page 263

246 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

स्वीकार नहीं कर सकता कि सच्चाई इसकी प्रमुख या एकमात्र कसौटी ही है, क्योंकि सच्चाई ही काफी नहीं होती। एक महापुरुष में सच्चाई तो होनी चाहिए, क्योंकि समूचे नैतिक गुणों के संगम के बिना कोई व्यक्ति महान नहीं कहला सकता। परंतु एक व्यक्ति को महान बनाने में केवल सच्चाई के अलावा भी कोई गुण होना चाहिए। एक व्यक्ति सच्चा हो सकता है, परंतु फिर भी वह मूर्ख हो सकता है। एक मुर्ख व्यक्ति एक महान व्यक्ति के ठीक विपरीत होता है। एक व्यक्ति इसलिए महान होता है कि वह समाज को संकट की घड़ी में से उबारने के लिए मार्ग ढूंढ लेता है। परंतु मार्ग को ढूंढ़ने में उसकी सहायता क्या चीज कर सकती है? वह ऐसा केवल प्रतिभा की सहायता से कर सकता है। प्रतिभा प्रकाश है। इसके अलावा और कोई चीज काम नहीं करती। यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि सच्चाई के बिना कोई व्यक्ति महान नहीं हो सकता। क्या एक महान व्यक्ति को बनाने के लिए यह पर्याप्त है? इस अवस्था में मेरे विचार से हमें एक प्रसिद्ध व्यक्ति और एक महान व्यक्ति में अंतर समझना चाहिए। क्योंकि मेरा निश्चय है कि एक महान व्यक्ति एक प्रसिद्ध व्यक्ति से बहुत ही भिन्न होता है। एक व्यक्ति की सच्चाई, ईमानदारी या निष्कपटता तथा प्रतिभा जैसे गुण उसे अपने साथियों की तुलना में प्रसिद्ध व्यक्ति होने के लिए पर्याप्त होते हैं। परंतु वे उसे एक महान व्यक्ति के पद व सम्मान तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त नहीं होते। एक महान व्यक्ति में मात्र एक प्रसिद्ध व्यक्ति की अपेक्षा कुछ अधिक होना चाहिए। वह अधिक चीज क्या होनी चाहिए? यहां पर दार्शनिक द्वारा दी गई महान व्यक्ति की परिभाषा का महत्व सामने आता है। एक महान व्यक्ति को सामाजिक उद्देश्य की गतिशीलता से प्रभावित होना चाहिए और उसे समाज के अंकुश तथा अपमार्जक के रूप में काम करना चाहिए। ये वे तत्व हैं, जिनसे एक महान व्यक्ति की एक प्रसिद्ध व्यक्ति से अलग पहचान की जा सकती है और इन्हीं में सर्वोत्तम कार्यों के सम्मान तथा आदर के उसके अधिकार निहित हैं।

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क्या रानाडे एक महापुरुष थे? उनका व्यक्तित्व निःसंदेह महान था। वह भीमकाय व्यक्ति थे। यह आशावादी स्वभाव, मिलनसार तथा हंसमुख मनोवृत्ति एवं बहुमुखी क्षमता वाले व्यक्ति थे। उनमें सच्चाई थी, जो सब नैतिक गुणों का संगम है और उनकी सच्चाई इस प्रकार की थी, जिसका वर्णन कार्लाइल ने किया है। वह दंभपूर्ण आत्म - श्लाघी सच्चाई नहीं थी। वह स्वाभाविक सच्चाई थी। वह एक मूलभूत व स्वाभाविक विशेषता थी, उसमें बनावट नहीं थी। वह न केवल डीलडौल तथा सच्चाई की दृष्टि से बड़े थे, बल्कि प्रतिभा के भी धनी थे। रानाडे एक उच्च प्रतिभा - संपन्न व्यक्ति थे। इसमें किसी व्यक्ति को संदेह नहीं हो सकता। वह उच्च न्यायालय के मात्र एक वकील तथा न्यायाधीश ही नहीं थे, बल्कि वह प्रथम श्रेणी के अर्थशास्त्री, प्रथम श्रेणी के इतिहासकार, प्रथम श्रेणी के शिक्षाविद तथा प्रथम श्रेणी के धर्मतत्वज्ञ भी थे। वह राजनीतिज्ञ नहीं थे। कदाचित, यह अच्छी बात