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रानाडे, गांधी और जिन्ना

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है कि वह राजनीतिज्ञ नहीं थे। क्योंकि यदि वह राजनीतिज्ञ होते, तो हो सकता है कि वह महान व्यक्ति न हो सकते। जैसा कि अब्राह्म लिंकन ने कहा था, ‘‘राजनीतिज्ञ ऐसे व्यक्ति होते हैं, जिनका हित लोक - हित से अलग होता है और जिनको अर्थात् उनमें से अधिकांश को समूह के रूप में लिया जाता है और वे ईमानदार मनुष्यों से काफी हटकर होते हैं।‘‘ रानाडे यद्यपि राजनीतिज्ञ नहीं थे, परंतु राजनीति के पारंगत विद्यार्थी थे। वास्तव में, भारत के इतिहास में रानाडे के समकक्ष व्यापक विद्वता, प्रचंड बुद्धि तथा दूरदृष्टि वाले किसी व्यक्ति को ढूंढना कठिन होगा। ऐसा कोई भी विषय नहीं था, जिसे उन्होंने छुआ न हो और जिसमें उन्होंने गूढ़ता व महारत हासिल न की हो। उनका अध्ययन विशाल स्तर का था और वह हर प्रकार से पूर्ण विद्वान थे। वह न केवल अपने समय के मापदंड के अनुसार, बल्कि किसी भी मापदंड के अनुसार महान थे। जैसा कि मैंने कहा है, महान व्यक्ति बनने का कोई भी दावा सच्चाई तथा प्रतिभा में से किसी एक पर या इनके संयुक्त रूप पर निर्भर नहीं होता। यदि रानाडे में ये दो गुण ही होते और इनसे अधिक गुण न होते तो उनको महान नहीं कहा जा सकता था। महान व्यक्ति होने की उनकी उपाधि, उन्होंने जो सामाजिक कार्य किए थे, जिस तरीके से वे कार्य किए, उस पर निर्भर करती है। इस संबंध में कोई संदेह नहीं हो सकता। रानाडे को एक इतिहासवेत्ता, अर्थशास्त्री या शिक्षाविद की अपेक्षा एक समाज सुधारक के रूप में ही अधिक जाना जाता है। उनका संपूर्ण जीवन ही समाज सुधार के लिए अनवरत अभियान में समर्पित रहा। समाज सुधारक के रूप में उनकी जो भूमिका रही है, वही उनके महान होने की उपाधि का आधार है। रानाडे में साहस तथा दूरदृष्टि दोनों ही थे, जिनकी आवश्यकता सुधारक के लिए होती है। जिन परिस्थितियों में उनका जन्म हुआ था, उनमें उनके साहस और दूरदृष्टि का बराबर का महत्व था। जिस कालखंड में वह जन्में थे, उसमें यह बात केवल अचरज की बात होती कि उनमें पैगम्बर की सी दूरदृष्टि थी। मैंने तो यह बात यहूदी दृष्टिकोण से कही है। रानाडे का जन्म 1842 में किर्की के युद्ध से लगभग 24 वर्ष बाद हुआ था। उस युद्ध में मराठा साम्राज्य का अंत हो गया था।

मराठा साम्राज्य के पतन ने विभिन्न लोगों के अंदर विभिन्न प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कीं। नातू जैसे कुछ लोग इस बात से प्रसन्न थे कि ब्राह्मण पेशवा का अभिशप्त शासन समाप्त हो गया है। परंतु इस बात में कोई संदेह नहीं हो सकता कि महाराष्ट्र में अधिकांश लोग इस घटना से स्तंभित रह गए थे। जब समूचा भारत विदेशी गिरोहों के बढ़ते कदमों से घिरता जा रहा था और भारत की जनता को तिल - तिल करके क्रमशः दास बनाया जा रहा था, तब यहां महाराष्ट्र के नन्हे से कोने में एक हट्टी - कट्टी जाति रहती थी, जो यह जानती थी कि स्वतंत्रता क्या होती है? उसने स्वतंत्रता के लिए भूरपूर लड़ाई लड़ी थी और मीलों तक इसकी स्थापना की थी। अंग्रेजों की विजय से उनकी यह अनमोल थाती समाप्त हो गई थी। इस बात की कल्पना की जा सकती है कि महाराष्ट्र की सर्वोत्तम प्रतिभा किस प्रकार पूर्णतया भौचक व हैरान हो गई थी और उसके सामने पूर्णतया अंधेरा