6. रानाडे, गांधी और जिन्ना - Page 265

248 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

छा गया था। ऐसी महान विपत्ति के प्रति क्या स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो सकती थी? यह होनी के आगे आत्म - समर्पण और घुटने टेकने के अलावा और क्या हो सकता है? इस पर रानाडे की क्या प्रतिक्रिया हुई? यह अत्यंत भिन्न रूप में हुई। आशा थी कि जो गिरे हैं, वे उठेंगे भी, वास्तव में उनके अंदर एक नया विश्वास उपजा जो इस आशा का आधार था। मैं उनके ही शब्दों का उद्धृत करता हूं :

‘‘मैं अपने धर्म के दो सिद्धांत के प्रति अनन्य आस्था व्यक्त करता हूं। हमारा यह देश आशावाद का साकार रूप है। हमारी जाति यह श्रेष्ठ जाति हैं।‘‘

वह आशा तथा विश्वास के नवीन मूसा सिद्धांत को केवल प्रस्तुत करके ही चुप नहीं बैठे। उन्होंने इस आशा की प्राप्ति के प्रश्न पर भी अपना ध्यान दिया। इसकी पहली आवश्यकता, वास्तव में पतन के कारणों का निष्पक्ष विश्लेषण करने की थी। रानाडे ने यह महसूस किया कि यह पतन हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में कुछ कमजोरियों के कारण हुआ था और जब तक इन कमजोरियों को दूर नहीं किया जाता, तब तक आशा व आकांक्षा पूरी नहीं हो सकती। अतएव उन्होंने नवीन सिद्धांत के बाद कर्तव्य के लिए आह्वान किया था। यह कर्तव्य हिन्दू समाज में सुधार करने के कर्तव्य के अलावा कोई और कर्तव्य नहीं था। अतएव सामाजिक सुधार उनके जीवन का एक प्रमुख उद्देश्य हो गया था। उनके अंदर सामाजिक सुधार की भावना विकसित हुई और इसका बढ़ावा देने में उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। इसके लिए उन्होंने जो तरीके अपनाए, उनमें बैठकें करना, शिष्ट मंडल भेजना, भाषण व उपदेश, लेख, साक्षात्कार व पत्र शामिल थे। ये सब कार्य उन्होंने निरंतर व अथक उत्साह के साथ किए। उन्होंने अनेक सभाओं, सोसायटियों की स्थापना की। उन्होंने कई पत्रिकाओं को स्थापित किया। परंतु वह इससे संतुष्ट नहीं हुए। वह सामाजिक सुधार के काम को बढ़ावा देने के लिए कुछ ऐसी चीजे चाहते थे, जो अपेक्षाकृत और अधिक स्थायी और अधिक व्यवस्थित हों। अतएव उन्होंने सामाजिक सम्मेलन (सोशियल कांफ्रेंस) नामक एक अखिल भारतीय संगठन की स्थापना की। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक सहायक के रूप में चला। सामाजिक बुराइयों पर चर्चा करने के लिए वर्षानुवर्ष बैठकें होती थीं। रानाडे हर वर्ष उसके वार्षिक अधिवेशनों में उपस्थित होते थे, जैसे कि यह उनकी तीर्थयात्रा हो वह सामाजिक सुधार के हेतु कार्य व उद्देश्यों को प्रोत्साहित करते थे।

सामाजिक सुधार के कार्य व हेतु को प्रोत्साहित करने में रानाडे ने बहुत उत्साह दिखाया। इस पीढ़ी के बहुत से लोग ऐसे दावे पर शायद हंसेंगे। जेल में जाना भारत में शहादत का काम हो गया है। इसे देशभक्ति का काम तथा साहस का काम माना जाता है। अधिकांश लोग जो अन्यथा ध्यान देने के अयोग्य होंगे और जिनके मामले में यह कहना ठीक ही हो सकता था कि वे बदमाश व दुष्ट थे जिन्होंने राजनीति को अपने अंतिम सहारे के रूप में अपना लिया था, जेल में जाकर वे शहीद हो गए हैं और उन्होंने नाम तथा प्रसिद्धि प्राप्त कर ली है, जो कम से कम कहने के लिए तो अति विस्मयकारी है। यदि जेल के जीवन में