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रानाडे, गांधी और जिन्ना

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वैसी यातनाएं होतीं, जिन्हें तिलक जैसे व्यक्तियों तथा उनकी पीढ़ी के लोगों ने सहा था तो इस विचार में कुछ सार होगी। जेल के जीवन में आज कोई आतंक या भय नहीं रहा है। यह अब केवल नजरबंदी का मामला हो गया है। राजनीतिक कैदियों को अब अपराधी नहीं माना जाता। उनको एक अलग श्रेणी में रखा जाता है। उनको किसी कठिनाई या परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता। उनकी प्रसिद्धि या प्रतिष्ठा को कोई ठोस नहीं पहुंचती और उनको अलग भी नहीं रखा जाता। इसके लिए किसी प्रकार के साहस की आवश्यकता नहीं। परंतु जब भी जब जेल के जीवन में, जैसा कि तिलक के समय में था, वास्तव में यातनाएं थीं। राजनीतिक बंदी एक समाज सुधारक से अधिक साहस रखने का दावा नहीं कर सकते थे। अधिकांश लोग यह महसूस नहीं करते हैं कि समाज एक व्यक्ति के विरुद्ध सरकार की अपेक्षा कहीं अधिक मात्रा में अत्याचार तथा दमनचक्र चला सकता है। दमन के जो साधन तथा क्षेत्र समाज के समक्ष खुले हैं, वे सरकार के समक्ष खुले साधनों तथा क्षेत्रों की अपेक्षा बहुत अधिक व्यापक हैं और वे उनसे अधिक प्रभावी भी हैं। दंड संहिता में ऐसे कौन से दंड की व्यवस्था है, जिसकी तुलना बहिष्कार के दंड की गंभीरता तथा मात्रा से की जा सके? अधिक साहस किसमें होता है? उस समाज सुधारक में जो समाज को चुनौती देता है और अपने लिए बहिष्कार की सजा को आमंत्रित करता है, या उस राजनीतिक बंदी में जो सरकार को चुनौती देता है और केवल कुछ महीनों की या कुछ सालों की जेल की सजा पाता है? इनमें एक और भी अंतर है, जिसे समाज सुधारक तथा राजनीतिक देशभक्त द्वारा दर्शाए गए साहस का अनुमान लगाने या मूल्यांकन करने में प्रायः ध्यान में नहीं रखा जाता। जब समाज सुधारक समाज को चुनौती देता है, तब कोई भी व्यक्ति उसको शहीद कहकर उसका स्वागत नहीं करता। कोई भी व्यक्ति उसका मित्र तक बनने के लिए तैयार नहीं होता। उससे लोग घृणा करते हैं और बचकर रहते हैं, परंतु जब राजनीतिक देशभक्त सरकार को चुनौती देता है, तो सारा समाज उसका समर्थन करता है। उसकी प्रशंसा की जाती है, उसकी सराहना की जाती है और उसे उद्धारक के रूप में तथा मुक्तिदाता के रूप में आदर किया जाता है। कौन अधिक साहस दिखाता है? वह समाज सुधार जो अकेला लड़ता है, या वह राजनीमिक देशभक्त जो बहुत बड़ी संख्या में अपने समर्थकों के सहयोग से लड़ता है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि रानाडे ने समाज - सुधार के कार्य को हाथ में लेते समय साहस दिखाया था। वास्तव में, उन्होंने उच्चकोटि का साहस दर्शाया था। क्योंकि आप यह बात याद रखें कि उनके समय में सामाजिक तथा धार्मिक प्रयासों तथा रीतिरिवाजों को, चाहे वे जितने घटिया तथा अनैतिक थे, परम पवित्र तथा अलंघनीय माना जाता था तथा जब उनके दैवी व उत्कृष्ट तथा नैतिक आधार पर कोई संदेह प्रकट करता था, या उस पर कोई प्रश्न खड़ा करता था, चुनौती देता था, तो उसकी बात को केवल एक अपसिद्धांत शासन विरुद्ध ही नहीं माना जाता था, बल्कि उसे असहनीय ईशनिंदा तथा धर्मविरोध व देवद्रोह के रूप में माना जाता था।