250 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
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एक सुधारक के रूप में उनका मार्ग सरल व निष्कंटक नहीं था। वह अनेक दिशाओं से अवरुद्ध था। जिन लोगों को वह सुधारना चाहते थे, उनकी भावनाएं प्राचीन अतीत में गहरी धंसी हुई थीं। उनका विश्वास था कि उनके पूर्वज सबसे अधिक बुद्धिमान तथा सबसे कुलीन व उत्कृष्ट व्यक्ति थे और उन्होंने सर्वोच्च आदर्श समाज व्यवस्था की स्थापना की थी। हिन्दू समाज की जो लज्जास्पद तथा त्रुटिपूर्ण बातें रानाडे को महसूस हुई, वे उनके लिए धर्म की सबसे पवित्र निषेधाज्ञाएं थीं। जनसाधारण की यह मनोवृत्ति थी। बुद्धि जीवी दो वर्गों में बंटे हुए थें एक वर्ग वह था जो रूढि़वादी विश्वास वाला था, परंतु उसका दृष्टिकोण राजनीतिक नहीं था और एक वर्ग वह था जो अपने विचारों से आधुनिक था, परंतु उसके लक्ष्य तथा उद्देश्य मूलतः राजनीतिक थे। पहले वर्ग का नेतृत्व श्री चितलेकर कर रहे थे और दूसरे का श्री तिलक। वे दोनों रानाडे के विरुद्ध एकजुट हो गए और उन्होंने उनके मार्ग में यथासंभव अधिक से अधिक कठिनाइयां उपस्थित कीं। उन्होंने केवल समाज सुधार के ध्येय को ही सबसे ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि जैसा कि अनुभव से पता चलता है, उन्होंने भारत में राजनीतिक सुधार के ध्येय को भी सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। राजनीति से विमुख या रूढि़वादी विचारधारा के लोग हेगलवादी दृष्टि में विश्वास रखते थे। यह मेरे लिए एक पहेली है, अर्थात आदर्श को प्राप्त करना तथा यथार्थ को आदर्श बनाना। इसमें यह बात एकदम गलत है। हिन्दू धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि आप इसके आदर्श स्वरूप को यथार्थता प्रदान करने के लिए आगे नहीं बढ़ सकते, क्योंकि आदर्श बुरा होता है। न ही आप यथार्थ को आदर्श की स्थिति पर पहुंचाने का प्रयास कर सकते हैं, क्योंकि यथार्थ अर्थात् वर्तमान परिस्थिति बद से भी बदतर है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। हिन्दू धार्मिक व्यवस्था को लीजिए या हिन्दू सामाजिक व्यवस्था को लीजिए और इसकी सामाजिक उपयोगिता तथा सामाजिक न्याय की दृष्टि से जांच कीजिए। यह कहा जाता है कि धर्म उस समय तक अच्छा होता है, जब वह टकसाल से ताजा - ताजा निकलता है। परंतु हिन्दू धर्म तो प्रारंभ से ही एक खोटा सिक्का जैसा रहा है। समाज के हिन्दू आदर्श ने जैसा कि हिन्दू धर्म द्वारा निर्धारित किया गया है, हिन्दू समाज पर सबसे अधिक भ्रष्ट करने वाले तथा विकृत करने वाले प्रभाव के रूप में कार्य किया है। उसका स्वरूप तथा तत्व नीत्शेवादी है। नीत्शे के जन्म लेने से बहुत पहले ही मनु ने उस सिद्धांत की घोषणा कर दी थी, जिसका प्रचार करने का नीत्शे ने प्रयास किया। यह एक ऐसा धर्म है, जिसका अभीष्ट स्वतंत्रता, समानता तथा भ्रातृत्व की स्थापना करना नहीं है। यह एक सिद्धांत है, जो शेष हिन्दू समाज द्वारा अतिमानव ब्राह्मण की पूजा व उपासना का पोषण करता है। यह इस बात को प्रस्तुत करता है कि अतिमानव तथा एकमात्र उसका वर्ग ही जीवित रहने तथा शासन करने के लिए उत्पन्न हुए हैं। दूसरे लोग जन्म उनकी सेवा करने के लिए ही होता है, अन्य किसी कार्य के लिए नहीं। उनका जीवन अपना जीवन नहीं होता और अपने स्वयं के व्यक्तित्व को विकसित करने