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रानाडे, गांधी और जिन्ना

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का उनको कोई अधिकार नहीं होता। यह हिन्दू धर्म का सिद्धांत रहा है। हिन्दू दर्शन, चाहे वह वेदांत हो या सांख्य, न्याय और वैशेषिक, हिन्दू धर्म को किसी रूप में प्रभावित किए बिना अपनी धुरी पर घूमता रहा है। इस सिद्धांत को चुनौती देने का साहस उसमें कभी नहीं हुआ। यह हिन्दू दर्शन को प्रत्येक वस्तु ब्रह्ममय है, केवल बुद्धि का ही खिलवाड़ रहा। यह कभी भी सामाजिक दर्शन नहीं हुआ। हिन्दू दार्शनिकों ने अपने दर्शन तथा अपने मनु, दोनों को अलग - अलग हाथों में रखा, दाएं को यह पता नहीं कि बाएं के पास क्या था। हिन्दू को उनके परस्पर विरोध से कभी कष्ट नहीं होता। जहां तक उनकी समाज - व्यवस्था का संबंध है, क्या उससे अधिक भ्रष्ट और कुछ हो सकता है? जातिप्रथा चातुर्वर्ण्य का जो कि हिन्दू का आदर्श है, एक भ्रष्ट रूप है। कोई व्यक्ति जो जन्मजात जड़बुद्धि या मूर्ख नहीं है, चातुर्वर्ण्य को समाज का आदर्श रूप कैसे स्वीकार कर सकता है? व्यक्तिगत रूप से तथा सामाजिक रूप से यह एक मूर्खता या अपराध है। केवल एक वर्ग को ही शिक्षा तथा ज्ञान प्राप्त करने का अधिकारी होना, केवल एक वर्ग को ही व्यापार करने का अधिकारी होना, केवल एक वर्ग को ही सेवा करने के लिए होना, व्यक्ति के लिए इसके परिणाम स्पष्ट व प्रत्यक्ष हैं। आपको ऐसा विद्वान व्यक्ति कहां मिल सकता है, जिसके पास आजीविका का कोई साधन न हो और वह अपनी शिक्षा को विकृत न करे? आपको ऐसा सिपाही कहां मिल सकता है, जिसकी कोई शिक्षा तथा संस्कृति न हो और वह अपने शस्त्रों का उपयोग संरक्षण के लिए करे, विनाश के लिए नहीं? आपको ऐसा व्यापारी कहां मिलेगा, जिसके पास फूटी कौड़ी तक न हो ओर वह ऐसी अर्जनवृत्ति अपना ले, जो घटिया स्तर पर न पहुंचे? आपको ऐसा सेवक कहां मिल सकता है जो न तो शिक्षा प्राप्त करे, न शस्त्र ग्रहण करे और न जीविकोपार्जन के अन्य साधन अपनाए और अपना मनचाहा निर्माता बने। यदि यह व्यक्ति के लिए हानिकारक है तो यह समाज को भी भेध्य तथा नाजुक बना देती है। समाज संरचना को केवल एक अच्छे मौसम के अनुकूल होना ही पर्याप्त नहीं है, उनके तूफान को झेलने की भी शक्ति होनी ही चाहिए। क्या हिन्दू वर्ग व्यवस्था किसी आक्रमण की झंझा को झेल सकती है? जाहिर है कि नहीं झेल सकती। चाहे प्रहार हो या प्रतिरक्षा, समाज को इस योग्य होना ही चाहिए कि वह अपनी शक्तियों का संघटन कर सके। जहां कर्तव्यों तथा दायित्वों का वितरण तथा निर्धारण एकांगी तथा अपरिवर्तनीय हो, वहां संगठन कैसे हो सकता है? नब्बे प्रतिशत हिन्दू - ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र - हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत शस्त्र धारण नहीं कर सकते थे। यदि देश की सैन्य - संख्या में खतरे के समय वृद्धि नहीं की जा सकती, तो देश की रक्षा किस प्रकार की जा सकती है? जैसा कि प्रायः आरोप लगाया जाता है, बुद्ध ने हिदू समाज को अपने अहिंसा के सिद्धांत द्वारा कमजोर बनाया था। हिन्दू समाज को कमजोर बनाने वाले बुद्ध नहीं, बल्कि चातुर्वर्ण्य का वह ब्राह्मणवादी सिद्धांत है जो न केवल हिन्दू, अपितु हिन्दू समाज के अपकर्ष के लिए भी उत्तरदायी है। आपमें से कुछ लोग मेरी उस बात को बुरा मानेंगे जो मैंने हिन्दू समाज पर हिन्दू सामाजिक - धार्मिक आदर्श के भ्रष्टकारी प्रभाव के विषय में कही है।