6. रानाडे, गांधी और जिन्ना - Page 269

252 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

परंतु सच्चाई क्या है? क्या इस आरोप का खंडन किया जा सकता है? क्या विश्व में ऐसा कोई समाज है, जहां ऐसे लोग रहते हों, जो एकदम अलग - थलग रहते हों और जिनकी परछाई पड़ना और जिन्हें देखना पाप हो। क्या कोई ऐसा समाज है जिसमें आपराधिक जनजातियां रहती हों? क्या कोई ऐसा समाज है, जिसमें नंग - धड़ंग आदिवासी एवं बनवासी हों? वे गिनती में कितने हैं? क्या वे सैकंड़ों की संख्या में है? क्या हजारों की संख्या में हैं? मेरी कामना है कि उनकी संख्या नगण्य हो। दुख की बात यह है कि उनकी संख्या लाखों में है? लाखों अछूत हैं, लाखों जरायम पेशा जनजातियां हैं, लाखों आदिम जनजातियां हैं। घोर आश्चर्य! हिन्दू सभ्यता, सभ्यता है या उसके नाम पर कलंक है? यह तो आदर्श का हाल है। अब आप उन परिस्थितियों की ओर ध्यान दीजिए, जो उस समय विद्यमान थीं, जब रानाडे मंच पर उतरे थे। जिस अधोगति की अवस्था में वे उस समय पहुंच गए थे, जब अंग्रेज मंच पर आए और रानाडे जैसे सुधारकों को उनका सामना करना पड़ा था, उस अवस्था को अब महसूस करना असंभव है। मैं बुद्धिजीवी वर्ग की दशा से आरंभ करता हूं। सभ्यता का पालनपोषण तथा मार्गदर्शन उसके बुद्धिजीवी वर्ग पर ब्राह्मणों द्वारा प्रदत्त नेतृत्व पर निर्भर होना ही चाहिए। प्राचीन हिन्दू कानून के अधीन ब्राह्मण को पुरोहित वर्ग का लाभ प्राप्त था और ब्राह्मण चाहे हत्या का दोषी हो, उसे फांसी की सजा नहीं दी जाती थी और ईस्ट इंडिया कंपनी उसे यह विशेषाधिकार 1817 तक देती रही। इसमें संदेह नहीं, क्योंकि उस पर श्रेष्ठता का ठप्पा लगा था। पर क्या उसमें कोई श्रेष्ठता शेष रह गई थी? उसके व्यवसाय की समूची श्रेष्ठता लुप्त हो चुकी थी। वह समाज के लिए दीमक बन चुका था। ब्राह्मण ने योजनाबद्ध तरीके से समाज को खोखला किया और धर्म का अनुचित लाभ उठाया। जिन दिनों पुराणों तथा शास्त्रों की रचना ब्राह्मण ने की, वे उन धूर्तताओं की अनमोल खोज है जिनका दुरुपयोग ब्राह्मणों ने निर्धन, अशिक्षित तथा अंधविश्वासी हिन्दू जन - साधारण को उल्लू बनाने, बहकाने तथा ठगने के लिए किया। इस भाषण में उनके संबंध में हवाला देना असंभव है। मैं यहां पर केवल उन बाध्यकारी उपायों को उल्लेख कर सकता हूं, जिन्हें ब्राह्मणों ने अपने अधिकारों तथा विशेषाधिकारों को भुनाने के लिए उन पर औचित्य तथा पवित्रता का ठप्पा लगाया और हिन्दुओं का अहित किया। जो लोग उनकी जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, वे 1795 के रेगुलेशन (विनिमय) XXI की प्रस्तावना को पढ़ें। उसके अनुसार जब कभी भी एक ब्राह्मण कोई भी ऐसी वस्तु प्राप्त करना चाहता था जिसे कि वह अपने शिकार से उसकी इच्छा से प्राप्त नहीं कर सकता था तो वह विभिन्न प्रकार के दबाव डालने वाले उपायों का सहारा लेता था। वह अपने शरीर को चाकुओं तथा उस्तरों से चीरता था, या किसी विष को निगलने की धमकी देता था। ये उसकी सामान्य चालें होती थी, जिनको वह अपनी स्वार्थ - पूति के लिए चलाता था। हिन्दुओं पर दबाव डालकर उन्हें मजबूर करने के लिए ब्राह्मणों द्वारा कुछ अन्य तरीके भी अपनाए जाते थे। वे जितने लज्जाजनक थे, उतने ही विलक्षण भी थे। एक सामान्य चलन यह था कि वह अपने शिकार के घर के सामने कूढ़ खड़ा कर देता था। कूढ़ एक गोल अहाता होता था, जिसमें एक लकड़ी का ढेर लगा दिया जाता था। अहाते के अंदर