रानाडे, गांधी और जिन्ना
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एक बुढि़या को बैठा दिया जाता था, जो उसके उद्देश्य की पूर्ति नहीं करने पर कूढ़ में जलने के लिए तैयार रहती थी। इस प्रकार का दूसरा उपाय यह था कि वह उसकी महिलाओं तथा बच्चों को अपने शिकार की नजरों के सामने बैठा देता था और उनके सिर काटने की धमकी देता था। तीसरी युक्ति धरने की थी। शिकार के द्वार पर अनशन किया जाता था। यह तो कुछ भी नहीं। ब्राह्मणों ने गैर - ब्राह्मणों की महिलाओं का कौमार्य भंग करने के अधिकार के लिए दावा करना आरंभ कर दिया था। इस चलन का प्रचलन कालीकट के जेमोरिन के परिवार में तथा वैष्णवों के वल्लभचारी संप्रदाय में था। ब्राह्मण अधोगति के रसातल में धंस चुका था। जैसा बाइबल कहती है, ‘‘यदि लवण ने अपनी लवणता खो दी हो तो किस तत्व से उसे लवणता प्रदान की जाए।‘‘ इसमें संदेह नहीं कि हिन्दू समाज ने अपने नैतिक बंधनों को ढीला करके उन्हें एक खतरनाक कगार पर पहुंचा दिया था। इस नैतिक अधोगति को रोकने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी को 1819 में एक विनिमय (1819 का VII ) पारित करना पड़ा। इस अधिनियम की प्रस्तावना में कहा गया है कि महिलाओं को बड़े पैमाने पर काम पर लगाया जाता था ताकि वे वेश्यावृति के लिए पत्नियों तथा बच्चियों को प्रलोभन देकर ले जाएं। यह एक सामान्य प्रथा थी। पति तथा पिता अपने परिवारों को तज देते थे। लोगों में विवेक था ही नहीं और उसके अभाव में सामाजिक पापों व अपराधों के विरुद्ध नैतिक रोष की आशा करना व्यर्थ ही था। वास्तव में, ब्राह्मण हर प्रकार के दोष, अपराध या पाप का समर्थन करने में लगे हुए थे। इसका एक सहज कारण यह था कि वह तो उनके जीवन की बैशाख थी। उन्होंने अस्पृश्यता का समर्थन किया। अस्पृश्यता ने लाखों लोगों को दासता के नरक में धकेल दिया। उन्होंने जातिवाद का समर्थन किया। उन्होंने बाल - विवाह और बाध्यकारी वैधव्य का समर्थन किया। वर्ण - व्यवस्था के ये दो घोर कलंक हैं। उन्होंने सती प्रथा का समर्थन किया। उन्होंने बहुविवाह के नियम वाली क्रमिक असमानता की समाज व्यवस्था का समर्थन किया। उसके कारण राजपूतों ने अपनी हजारों पुत्रियों का गला जन्म लेते ही घोंट दिया। घोर लज्जाजनक! घोर पाप! क्या ऐसा समाज सभ्य राष्ट्रों को अपना मुंह दिखा सकता है? क्या ऐसा समाज अपने अस्तित्व के बने रहने की आशा कर सकता है? ऐसे प्रश्न उठाए रानाडे ने। उनका निष्कर्ष था कि यदि जीवित रहना है तो कठोर सामाजिक सुधार करने होंगे।
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तथापि उनके सबसे बड़े विरोधी राजनीतिक वर्ग के बुद्धिजीवी थे। इन राजनीतिक लोगों ने एक नई अभिधारणा विकसित की। उस अभिधारणा के अनुसार राजनीतिक सुधार को सामाजिक सुधार पर अग्रता प्रदान करना था। इस अभिधारणा पर मंचों पर तर्क प्रस्तुत किए गए और इसका समर्थन बंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति तैलंग जैसे प्रसिद्ध लोगों ने किया। वह एक कुशाग्र बुद्धि वकील थे। उन्होंने उत्कृष्ट कौशल से यह कार्य किया। इस अभिधारणा ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। समाज सुधार आंदोलन