6. रानाडे, गांधी और जिन्ना - Page 271

254 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

के मार्ग में बाधा डालने वाले यदि किसी एक कारण को उत्तरदायी ठहराया जाए तो यह राजनीतिक सुधार की इस मांग को ठहराया जा सकता है। इस अवधारणा का समर्थन नहीं किया जा सकता और मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि रानाडे के विरोधी गलत थे और उन्होंने इसके अनुसार काम करके देश का हित नहीं किया। जिस आधार पर न्यायमूर्ति तेलंग ने राजनेताओं की अभिधारणा का समर्थन किया था, वह वास्तव में तर्कसंगत था। परंतु वह इस बात को पूर्णतया भूल गए कि तर्क विवेक नहीं होता और साहस तर्क नहीं होता। उन्हें ‘सामाजिक‘ तथा ‘राजनीतिक‘ के बीच परस्पर संबंध की वह सही समझ नहीं थी, जो इस विषय में रानाडे को थी। आइए, हम इस अभिधारणा के कारणों की जांच करें। जो तर्क दिए गए थे, वे बहुत प्रभावशाली नहीं थे। परंतु मैं उन सबसे प्रभावशाली तर्कों का सामना करने के लिए तैयार हूं, जो दिए जा सकते थे। फिर भी यह अभिधारणा टिक नहीं पाएगी। मुझे जो बातें सबसे अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती हैं, वे हैं : सर्वप्रथम, यह कहा जा सकता है कि हम पहले राजनीतिक शक्ति चाहते हैं, क्योंकि हम लोगों के अधिकारों की रक्षा करना चाहते हैं। यह उत्तर सरकार के एक बहुत ही साधारण सिद्धांत की उपज है, जिसका प्रतिपादन अमरीकी राजनेता जेफरसन ने किया था। उनके मतानुसार राजनीति राज्य द्वारा शासन का केवल एक कार्य है, जिससे कि लोगों के अधिकारों को बिना किसी बाधा के बनाए रखा जा सके। मान लीजिए कि यह सिद्धांत ठोस है। प्रश्न यह है कि यदि कोई अधिकार है ही नहीं तो राज्य शासन किस पर करेगा?

शासन के पक्ष को सारभाग गंभीरता प्रदान करने के लिए अधिकार तो होने ही चाहिए। प्रत्यक्ष है कि यह अभिधारणा कि राजनीतिक सुधार सामाजिक सुधार से पहले होना चाहिए तब तक एक निरर्थक प्रस्ताव रहता है, जब तक कि विचार यह हो कि सरकार का काम उन लोगों की रक्षा करना होता है, जिनके पास निहित अधिकार होते हैं और उनको दंड देना होता है, जिसके पास कुछ नहीं होता। दूसरा आधार जिस पर इस अभिधारणा के समर्थन में जोर दिया जा सकता है, वह है कि वे राजनीकि शक्ति प्राप्त करना चाहते हैं। वे प्रत्येक व्यक्ति को कानून द्वारा कुछ मूल अधिकार देना चाहते हैं। और ये तभी दिए जा सकते हैं, जब पहले राजनीतिक शक्ति प्राप्त कर ली जाए। यह बात निःसंदेह ऊपर से बहुत युक्तिपूर्ण लगती है। परंतु क्या इसमें कोई सार है? मूल अधिकारों का विचार अमरीकी संविधान में तथा क्रांतिकारी फ्रांस द्वारा निर्मित संविधान में उन्हें अधिनियमित करने के समय से सुविदित हो गया है। प्रत्येक व्यक्ति को मूल अधिकार प्रदान करने का विचार निःसंदेह बहुत ही प्रशंसनीय है। प्रश्न यह है कि उनको कारगर किस प्रकार बनाया जाए? प्रचलित मत यह है कि जब अधिकारों का विधि में अधिनियमन हो जाता है तो वे सुरक्षित हो जाते हैं। यह फिर एक अनुचित मान्यता है। अनुभव तो यह सिद्ध करता है कि अधिकारों की रक्षा कानून के द्वारा नहीं, बल्कि समाज की सामाजिक तथा नैतिक चेतना द्वारा की जाती है। यदि सामाजिक चेतना ऐसी है कि वह उन अधिकारों को मान्यता देने के लिए तैयार है