6. रानाडे, गांधी और जिन्ना - Page 272

रानाडे, गांधी और जिन्ना

255

जिनका अधिनियमन कानून करता है, तो अधिकार सुरक्षित रहेंगे। परंतु यदि मूल अधिकारों का समुदाय द्वारा विरोध किया जाता है तो कोई कानून, कोई संसद, कोई न्यायपालिका, वास्तविक अर्थ में उनकी गारंटी नहीं दे सकती। अमरीका में नीग्रो लोगों के लिए, जर्मनी में यहूदियों के लिए, भारत में अछूतों के लिए मूल अधिकारों की क्या उपयोगिता है? बर्क ने कहा कि भीड़ व बहुसंख्या को दंड देने के लिए कोई तरीका नहीं मिलता। कानून एक एकाकी उदंड अपराधी को दंड दे सकता है। यह उन लोगों के समूचे निकाय के विरुद्ध कभी कार्यवाही नहीं कर सकता, जो उसका विरोध करने का निश्चय कर लेते हैं।

कोलरिज के शब्दों में, ‘‘सामाजिक चेतना आत्मा का वह शांत एवं सच्चरित्र विधायक है, जिसके प्रभाव में शेष सभी शक्तियां आपस में टकराएंगी। वही समस्त मूल अथवा अमूल अधिकारों की एकमात्र रक्षिका है।‘‘

राजनीतिक लोगों का तीसरा तर्क स्व - शासन के अधिकारों पर आधारित हो सकता है। स्वशासन अच्छे शासन से बेहतर होता है। यह एक सुविदित नारा है। इसे एक नारे से अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता और सभी इस बात से आश्वस्त होना चाहेंगे कि स्वशासन भी एक अच्छा शासन होगा। इसमें संदेह नहीं कि राजनीतिक लोग उत्तम शासन चाहते हैं और उनका उद्देश्य लोकतंत्रात्मक शासन की स्थापना करना है। परंतु उन्होंने कभी भी शांत मन से इस बात पर विचार नहीं किया कि क्या लोकतंत्रात्मक शासन संभव है। उनका दावा अनेक भ्रांतियों पर आधारित है। लोकतंत्रात्मक शासन के लिए लोकतंत्रात्मक समाज का होना बहुत आवश्यक होता है। प्रजातंत्र के औपचारिक ढांचे का कोई महत्व नहीं है और यदि सामाजिक लोकतंत्र नहीं है तो वह वास्तव में अनुपयुक्त होगा। राजनीतिक लोगों ने यह कभी भी महसूस नहीं किया कि लोकतंत्र शासन तंत्र नहीं है। यह वास्तव में समाज तंत्र है। लोकतंत्रात्मक समाज के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उसमें एकता, सामुदायिक उद्देश्य, लोकहित के प्रति निष्ठा तथा पारस्परिक सहानुभूति जैसी विशेषताएं हों। परंतु उसके लिए दो बातें तो सुस्पष्ट रूप में आवश्यक होती हैं। पहली है - मनोवृत्ति, अपने साथियों के प्रति समानता तथा आदर का भाव। दूसरी है - एक सामाजिक संगठन जो कठोर सामाजिक बंधनों से मुक्त हो। लोकतंत्र की अलगाव - थलगाव तथा एकांतिकता के साथ संगति नहीं होती। उनके फलस्वरूप सुविधा प्राप्त एवं सुविधा विहीन लोगों के बीच दरार पैदा होती है। दुर्भाग्यवश रानाडे के विरोधियों ने इस तथ्य की सच्चाई को कभी भी महसूस नहीं किया।

इसकी परख के लिए कोई भी कसौटी अपनाई जा सकती है और उससे यह पता चलेगा कि इस विवाद में रानाडे ने जो रुख और कार्ययोजना अपनाई, भले ही वे राजनीतिक सुधार की पूर्व आवश्यकताएं नहीं थीं, पर वे सही तथा बुनियादी थीं। रानाडे ने यह तर्क दिया कि हिन्दू समाज में ऐसे कोई अधिकार नहीं है, जिन्हें मनुष्य नैतिक दृष्टि से मान्यता दे सके। उसमें मुट्ठी भर लोगों के लिए विशेष सुविधाएं और विशाल बहुसंख्य जनसमूह