6. रानाडे, गांधी और जिन्ना - Page 279

262 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

इन दो महापुरुषों के हाथों में रानीतिक बेतुके कार्यों की होड़ बनकर रह गई है। यदि गांधीजी को महात्मा गांधी कहा जाता है, तो जिन्ना को कायदे आजम कहा ही जाना चाहिए। यदि गांधी की कांग्रेस है, तो जिन्ना की मुस्लिम लीग होनी ही चाहिए। यदि कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी है, तो मुस्लिम लीग की भी कार्यकारिणी समिति और परिषद होनी ही चाहिए। कांग्रेस अधिवेशन के बाद लीग का अधिवशन होना ही चाहिए। यदि कांग्रेस कोई बयान जारी करती है तो लीग को भी वैसा ही करना ही चाहिए। यदि कांग्रेस सत्तरह हजार शब्दों का संकल्प पारित करती है, तो मुस्लिम लीग को कम से कम अठारह हजार शब्दों का तो संकल्प पारित करना ही चाहिए। यदि कांग्रेस का अध्यक्ष कोई प्रेस कांफ्रेंस बुलाए, तो मुस्लिम लीग का अध्यक्ष भी अवश्य ही वैसा करे। यदि कांग्रेस संयुक्त राष्ट्र से कोई अपील करे, तो मुस्लिम लीग भी पीछे क्यों रहे। कब यह सब समाप्त होगा? कब उनके बीच कोई समझौता होगा, निकट भविष्य में तो कोई आशा नहीं है। वे केवल अनर्गल शर्तों को लेकर ही भेंट करेंगे। जिन्ना का आग्रह है कि गांधी स्वीकार करें कि वह हिन्दू हैं। गांधी का आग्रह है कि जिन्ना स्वीकार करे कि वह भी एक मुस्लिम नेता है।

कूटनीतिज्ञता का ऐसा खोखला और दयनीय दिवालियापन तो कभी देखने में नहीं आया, जैसा कि भारत में इन दोनों नेताओं के आचरण मेंं दीख रहा है। वे वकीलों की भांति लंबे - चौड़े अनंत भाषण दे रहे हैं। वकीलों का तो काम ही है कि वह बात - बात पर बहस करें, कुछ भी स्वीकार न करें और समय का रुख देखकर बात करें। गतिरोध को समाप्त करने के लिए उनमें से किसी को भी कोई सुझाव दें तो सदा यही उत्तर मिलेगा, ‘नहीं‘। उनमें से कोई भी समस्या के उस समाधान पर विचार नहीं करेगा, जो सनातन नहीं है। प्रसिद्ध वाणिज्यिक उक्ति के अनुसार उनके चक्कर में फंसकर राजनीति का ‘दिवाला पिट गया है‘ और कोई भी राजनीतिक लेन - देन नहीं हो सकता।

इन दोनों की तुलना में रानाडे कैसे हैं? इस बारे में मेरा अपना कोई निजी अनुभव नहीं है। पर दूसरों ने जो कहा है, उसे मैंने पढ़ा है। उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि वे कैसे रहे होंगे। अहंभाव तो उनमें था ही नहीं। अपनी उपलब्धियों के आधार पर यदि वे कितना भी गर्व ही नहीं, अपितु धृष्टता भी कर लेते तो भी अनुचित नहीं होगा। लेकिन वे तो अति सरल व्यक्ति थे। गंभीर युवा वर्ग उनकी विद्वत्ता और हंसमुख स्वभाव पर मुग्ध था। अनेक युवक तो पूर्णतया उनके रंग में रंग गए। उन्होंने उनके उदात्त स्वभाव और प्रभाव को ग्रहण किया और अपने पूज्य शिक्षक के प्रति असीम श्रद्धा रखते हुए अपने संपूर्ण जीवन को उनकी शिक्षा के अनुरूप ढाल लिया। वह कभी भी मूर्खों की प्रशंसा से फूलकर कुप्पा नहीं हुए। वह कभी भी अपनी बराबरी वालों से मिलने से नहीं