रानाडे, गांधी और जिन्ना
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कतराए। उसी के अनुसार उनका लेन - देन चलता रहा। उन्होंने कभी अपने को अंतःकरण की आवाज पर निर्भर करने वाला रहस्यवादी घोषित नहीं किया। वह तर्कनिष्ठ थे। वह सदा ही अपने विचारों को तर्क और अनुभव की कसौटी पर कसे जाने के लिए तत्पर रहते थे। उनकी महानता सहज एवं स्वाभाविक थी। न तो उन्हें किसी स्टेज की और न ही किसी ओढ़ी गई सनक की या विज्ञापन के बल पर खरीदे गए समाचारपत्रों के सहारे की कोई जरूरत थी। जैसा कि मैं बता चुका हूं, रानाडे मुख्यतः समाज सुधारक थे। वह ऐसे राजनेता नहीं थे, जो राजनीति का व्यापार करता है। लेकिन भारत की राजनीतिक प्रगति में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। कुछ ऐसे राजनेताओं के तो वह गुरु रहे, जिन्होंने असाधारण सफलताएं प्राप्त कीं और अपनी प्रतिभा से अपने आलोचकों को चमत्कृत कर दिया। कुछ का उन्होंने मार्गदर्शन किया, पर सभी को उन्होंने दर्शन का पाठ पढ़ाया।
रानाडे का राजनीतिक दर्शन क्या था? तीन सूत्रों में उनका सार इस प्रकार है :
(1) किसी कोरे काल्पनिक आदर्श की तो हमें स्थापना करनी ही नहीं चाहिए। निश्चय
ही आदर्श ऐसा होना चाहिए कि वह आश्वासन दे कि वह व्यवहार योग्य है।
(2) राजनीति में बुद्धि और सिद्धांत से कहीं अधिक महत्व जन - भावना और जन -
स्वभाव का है। संविधान की रचना के विषय में तो खासतौर पर ऐसा ही है।
कपड़ों की भांति संविधान भी रुचित का विषय है। दोनों ही सही नाम के हों,
दोनों ही रुचिकर हों।
(3) राजनीतिक वार्ता में नियम यही होना चाहिए कि क्या संभव है। इसका अर्थ यह
नहीं कि जो भी दिए जाने का प्रस्ताव किया जाए, उसी से हम संतोष कर लें।
जी नहीं। इसका अर्थ है कि जो भी दिए जाने का प्रस्ताव किया जाए, उसे तो
स्वीकार कर ही लेना चाहिए, जब कि हम जानते हों कि हमारा दबाव इतना
भारी नहीं है कि वह विरोधी को और अधिक देने के लिए विवश कर सके।
रानाडे के राजनीतिक दर्शन के ये तीन प्रमुख सिद्धांत हैं। उनका दिग्दर्शन अति सरल कार्य है। उसके लिए उनके लेखों तथा भाषणों से समुचित उद्धरण दिए जा सकते हैं। पर उसके लिए न तो समय है और न ही कोई आवश्यकता है।, क्योंकि रानाडे के भाषणों तथा लेखों का अध्ययन करने वाले के लिए वे स्पष्ट होंगे ही। इन तीन सिद्धांतों के बारे में रानाडे से विवाद करने वाला हो ही कौन सकता है और यदि हो भी तो विवाद किस पर करेगा? सर्वप्रथम के बारे में कोई स्वप्न - द्रष्टा ही विवाद करेगा। हमें उसकी ओर ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं है। दूसरा सिद्धांत इतना स्पष्ट है कि यदि हम उसकी उपेक्षा करेंगे तो हम ही नुकसान उठाएंगे। तीसरा प्रस्ताव कुछ ऐसा है, जिसके