6. रानाडे, गांधी और जिन्ना - Page 281

264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

बारे में मतभेद हो सकता है। दरअसल, इसी ने उदार पंथियों को कांग्रेसियां से अलग किया। मैं उदारपंथी नहीं हूं, पर मुझे पूर्ण विश्वास है कि रानाडे का दृष्टिकोण सही था। सिद्धांत के बारे में कोई समझौता नहीं हो सकता और होना भी नहीं चाहिए। लेकिन यदि एक बार सिद्धांत के बारे में सहमति हो जाए तो इस बारे में कोई आपत्ति नहीं हो सकती कि उसे किस्तों में भुनाया जाए। राजनीति में तो किस्तें चलेंगी ही और जब सिद्धांत को स्वीकार कर लिया जाता है तो वह हानि नहीं पहुंचाता और वास्तव में ऐसा हो सकता है कि किन्हीं परिस्थितियों में वह नितांत लाभप्रद हो। इस तीसरे सिद्धांत के बारे में रानाडे और तिलक के बीच वास्तव में कोई मतभेद नहीं था, केवल एक अपवाद था। तिलक का विचार था कि दबाव डालकर संभव को अधिक से अधिक संभव बनाया जा सकता है। रानाडे दबावों को संदेह ही दृष्टि से देखते थे। बस केवल यही भेद था। शेष के बारे में वह सहमत थे। दबाव के प्रभाव से रानाडे के राजनीतिक दर्शन का महत्व नहीं घटता। कौन नहीं जानता कि कौन से दबाव हमारी झोली में हैं। हमने पुराने-नए सभी को तो आजमा लिया है। नतीजा क्या निकला, इसे बताने की जरूरत नहीं।

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रानाडे का जन्मदिन मनाते समय हमें आलोचकों तथा विरोधियों की संभावित प्रतिक्रिया की उपेक्षा नहीं करनी होगी। आलोचक पूछेंगे कि रानाडे का जन्मदिन मनाने की क्या तुक है? उनका तर्क होगा कि नायक-पूजा के दिन तो कब के लद चुके हैं। विरोधी कहेंगे कि जब मैं गांधी तथा जिन्ना के मामले में नायक-पूजा की निंदा करता हूं तो श्री रानाडे को नायक‘ कैसे बना रहा हूं। यह बड़ा ही संगत प्रश्न है। यह सच है कि नायक-पूजा अब दम तोड़ रही है। उसके बारे में हमें कोई संदेह नहीं है। कालाईल के जमाने में भी वह दम तोड़ रही थी, जब उन्होंने बड़े ही रोष से अपने जमाने के विरूद्ध शिकायत करते हुए कहा था :

‘‘यह कैसा जमाना है। वह तो महापुरुषों के अस्तित्व को ही नकारता है, महापुरुष तो होने ही चाहिए, इसे भी वह नकारता है। हमारे आलोचकों को महापुरुष दिखाओ। उसके बारे में लेखा-जोखा दो, उसकी पूजा न करो, उसकी तो दर्जी की भांति नाप-जोख करो।’’

लेकिन निश्चय ही भारत में नायक-पूजा ने दम नहीं तोड़ा है। मूर्ति-पूजा के क्षेत्र में वह आज भी ‘अद्वितीय’ है। यहां धर्म में मूर्ति-पूजा है। यहां राजनीतिक में मूर्ति-पूजा है। भले ही दुर्भाग्य की बात हो, पर भारत के राजनीतिक जीवन में नायक और नायक-पूजा एक जीता जागता तथ्य है। मै। मानता हूं कि नायक-पूजा भक्त को भ्रष्ट और देश को नष्ट करती है। मैं आलोचना का उस हद तक स्वागत करता हूं, जिस हद तक वह एक चेतावनी देती है कि पहले हम अच्छी तरह छानबीन कर ही लें कि हमारा पुरुष महापुरुष है और फिर हम उसकी पूजा शुरू करें। लेकिन दुर्भाग्य से यह कोई आसान काम नहीं है।