रानाडे, गांधी और जिन्ना
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उसका कारण है। यदि समाचार-पत्र में हों तो महापुरुष का उत्पादन बाएं हाथ का खेल है। कार्लाइल ने इतिहास के महापुरुषों का वर्णन करते समय एक मजेदार उक्ति का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि वे अनेकों बैंक नोटों जैसे हैं। बैंक नोटों की भांति वे स्वर्ण के प्रतीक हैं। हमें देखना यह है कि वे जाली नोट तो नहीं हैं। मैं मानता हूं कि महापुरुषों की पूजा में हमें अधिक सचेत रहना चाहिए। उसका कारण है। इस देश में हम संभवतः एक ऐसी स्थिति में पहुंच चुक हैं कि जहां - जहां नोटिस बोर्डों पर लिखा हो ‘जेबकतरों से सावधान‘, वहां - वहां ऐसे नोटिस बोर्ड भी हों ‘महापुरुषों से सावधान‘। महापुरुषों की पूजा के पक्षधर कालाईल ने भी अपने पाठकों को सचेत करते हुए कहा था : ‘‘इतिहास में ऐसे ढेर सारे महापुरुष गिनाए गए हैं, जो झूठे और स्वार्थी थे।‘‘ गहरा खेद व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘विश्व का (श्रृद्धांजलि रूपी) वेतन (इन तथाकथित महापुरुषों) की जेबों में चला जाता है। विश्व का कार्य नहीं सधता। नायक तो बाहर निकल गए हैं; नीम हकीम भीतर घुस आए हैं।‘‘
रानाडे को देवताओं जैसा वह सम्मान तो नहीं मिला, जो भारत के इन महापुरुषों के भाग्य में आज बड़ा है। मिलता भी कैसे? उनके पास कोई सीधा ईश्वरीय संदेश तो था नहीं। न तो उनके पास कोई चमत्कार था और न ही किसी चमत्कार - प्रदर्शन का उन्होंने वायदा किया। न तो सरस्वती के अवतार थे और न ही उनके पास कोई दैवी शक्तियां थीं। लेकिन इन अभावों को उन्होंने पूरा किया। भले ही रानाडे ने प्रभुत्व और चमत्कार नहीं दिखाया, पर आपदाओं का पहाड़ भी हमारे सामने खड़ा नहीं किया। भले ही भारत की सेवा के लिए उनके पास कोई दैवी शक्तियां नहीं थीं, पर उनके दुरुपयोग के संकट से भी तो वह बचा रहा। भले ही वह सरस्वती के अवतार नहीं थे, पर उन्होंने बुद्धि और मनोवृत्ति का वह विकृत विंतडावाद भी तो नहीं दिखाया, जिसकी बुनियाद ही बेईमानी पर
खड़ी होती है। उसने तो विश्वास के बीज बो दिए हैं और समझौते को दूभर बना दिया है। अतिउल्लास और असंयम पर उनका पूर्ण अंकुश था। उन्होंने अतिवाद का सहारा लेकर सस्ती प्रसिद्धि नहीं बटोरी। लोगों की देश - प्रेम की भावनाओं से हेरा - फेरी और खिलवाड़ करके उन्होंने लोगों को गुमराह नहीं किया। उन्होंने कभी भी ऐसे घटिया हथकंडों का इस्तेमाल नहीं किया। उनमें शोर तो होता है, पर जोर नहीं। वे न तो त्रुटिहीन होते हैं और न ही धूर्तता विहीन। वे तो देश के प्रति उत्साही तथा निष्ठावान सेवकों की भी कमर तोड़ देते हैं, पंगु बना देते हैं। वे कैसे आगे बढ़े? संक्षेप में रानाडे तो एक बुद्धिमान कप्तान की भांति थे। वह जानता है कि केवल प्रभाव ओर प्रदर्शन के लिए महासागर के बीचोंबीच अपने जहाज के साथ चतुराई भरी चालबाजियां नहीं कर सकता और उसका कर्तव्य है कि वह उसे नियत बंदरगाह तक सुरक्षित ले जाए। संक्षेप में, रानाडे जाली बैंक नोट नहीं थे। उनकी पूजा करते समय हम यह अनुभव नहीं करते कि हम किसी झूठे और घटिया आदमी के सामने घुटन टेक रहे हैं।
वैसे भी रानाडे का यह जन्मदिन समारोह नायक - पूजा है ही नहीं। एक तो नायक - पूजा