6. रानाडे, गांधी और जिन्ना - Page 283

266 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

यह है कि हम उसके प्रति अपार आभार व्यक्त करें। नायक की जी - हुजूरी करना एक नितांत भिन्न प्रकार की नायक - पूजा है। पहली में कोई दोष नहीं है, पर दूसरी निःसंदेह अति जघन्य हैं पहली तो हर उदात्त चीज के प्रति मानव का आदर भाव है। महापुरुष तो केवल उसका साकार रूप होता है। दूसरी तो अपने स्वामी के प्रति खलनायक की स्वामी - भक्ति है। पहली सदाचार का लक्षण है, तो दूसरी दुराचार का। पहली उसकी सोचने की शक्ति और कार्य करने की आजादी नहीं छीनती। दूसरी तो हमें काठ का उल्लू बनाती है। पहली में राज्य के लिए विनाश की संभावना नहीं होती। दूसरी में तो खतरा ही खतरा होता है। संक्षेप में, रानाडे का जन्मदिन मनाकर हम ऐसे आका की पूजा नहीं कर रहे हैं, जो न तो किसी के द्वारा चुना जाता है, न किसी के प्रति उत्तरदायी है और न किसी के द्वारा हटाया जा सकता है, बल्कि हम तो प्रशंसा - सुमनों से ऐसे नेता को श्रद्धांजलि दे रहे हैं, जिसने लोगों का मार्गदर्शन किया। उन्हें ढोरों की तरह हांका नहीं। उसने तो उनके सुविचारित निर्णय को कार्यरूप देने का प्रयास किया। उसने हेरा - फेरी अथवा हिंसा से उन पर अपनी इच्छा लादने और थोपने का प्रयास नहीं किया।

यह जन - समुदाय नायक - पूजा के लिए एकत्रित नहीं हुआ है। यह तो बात का अवसर है कि हम रानाडे के राजनीतिक दर्शने को अपने मन में पुनः ताजा कर सकें। मेरे विचार में यह आवश्यक हो गया है कि हम समय - समय पर अपने मन में उसकी याद को ताजा करते रहें। कारण यह है कि उनका दर्शन खतरनाक और खोखला नहीं है, भले ही वह मंद हो। भले ही उसमें चमक - दमक न हो, फिर भी वह सोना है। क्या किसी को संदेह है? यदि है तो वे बिस्मार्क, बाल्फोर तथा मोर्ले के इन उद्गारों पर मनन करें। महान जर्मन नेता बिस्मार्क ने कहा था : ‘‘राजनीति तो संभव का मायाजाल है।‘‘

ब्रिटिश संविधान पर वाल्टर बाजेट की प्रसिद्ध पुस्तक की अपनी भूमिका में बाल्फोर ने कहा है :

‘‘यदि हमें उस दीर्घकालीन प्रक्रिया के सही आधार को खोजना है जिसने मध्यकालीन राजतंत्र को आधुनिक लोकतंत्र में परिणत किया है और जिसके द्वारा अत्यधिक परिवर्तन हुआ है व अतिअल्प विनाश हुआ है, तो हमें प्रतिभा और सिद्धांत के स्थान पर स्वभाव और चरित्र का अध्ययन करना ही होगा। यह एक ऐसा सच है, जिसे याद रखना उन लोगों के लिए लाभकारी होगा, जिन्होंने पराए देशों में ब्रिटिश संस्थानों को शत - प्रतिशत ज्यों - का - त्यों अंगीकार किए जाने की सिफारिश की है। ऐसा प्रयोग खतरे से खाली नहीं हो सकता। संविधानों की नकल करना तो आसान है, पर स्वभावों की नहीं और यदि ऐसा हो जाए कि उधार लिए हुए संविधान और स्वभाव की संगति न बैठे, तो इस असंगति के भयंकर दुष्परिणाम निकल सकते हैं। इसका कोई खास महत्व नहीं कि वहां के लोग कौन से अन्य गुणों से संपन्न हैं, यदि उनमें निम्न की कमी है जो इस दृष्टि से सर्वाधिक