रानाडे, गांधी और जिन्ना
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महत्व के हैं। यथा, यदि उनमें यह क्षमता नहीं है कि वे अपनी निष्ठाओं का क्रम - निर्धारण नहीं कर सकते तथा उनसे प्रभावित नहीं हो सकते; यदि वे स्वातंत्र्य के प्रति सहज रुचि और कानून के प्रति सहज आदरभाव नहीं रखते, यदि उनमें मधुर हास्य का अभाव है और वे बेईमान को बर्दाश्त करते हैं; यदि वे नहीं जानते कि कब और कैसे समझौता किया जाए; यदि वे भयंकर दुष्परिणामों के प्रति वह अविश्वास नहीं करते जिसे कभी - कभी गलत ढंग से तर्क का प्रभाव कहा जाता है; यदि भ्रष्टाचार से उन्हें घृणा नहीं होती और यदि उनके विभाजन या तो असंख्य या फिर अति गहरे होते हैं तो ब्रिटिश संस्थानों का सफल कार्यकरण कठिन अथवा असंभव हो सकता है। उन स्थानों पर तो वास्तव में इनके प्रति क्षीण संभावना है जहां संसदीय अनुनय - विनय की कलाओं तथा दल प्रबंधन की दक्षताओं को पूर्णता का सर्वोच्च स्तर प्रदान किया जाता हैं।‘‘
मोर्ले ने कहा है :
‘‘तार्किक पूर्णता के पीछे भागना उस सामाजिक ताने - बाने की सामग्री का अज्ञान जताना है, जिससे कि राजनेता का पाला पड़ता है। विचार अथवा संस्था में सजीव परिवर्तन के अभाव की उपेक्षा करना मोह तथा आसक्ति है। घड़ी - घड़ी ऐसे परिवर्तन करना, भले ही वे किए जा सकते हों, बज्र मूर्खता है। मार्मिक फ्रेंच उक्ति है कि छोटे - छोटे सुधार बड़े सुधारों के कट्टर शत्रु हैं। आमतौर पर इसका इस्तेमाल इस दृष्टि से किया जाता है कि वह सामाजिक विनाश का संकेत है।‘‘
ये वे सिद्धांत हैं जिन पर राजनीतिक सफलता निर्भर करती है। क्या वे रानाडे द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों से भिन्न हैं। यह रानाडे की महानता का प्रमाण है कि बिस्मार्क, बाल्फोर तथा मोर्ले से वर्षों पूर्व उन्होंने इन सिद्धांतों का प्रतिपादन कर दिया था।
जिस पीढ़ी की सेवा रानाडे ने की, वह बुद्धिमान थी। उसने उन्हें अपना राजनीतिक पथ - प्रदर्शक, मित्र तथा दार्शनिक सलाहकार स्वीकार किया। उनकी महानता शाश्वत है। वे केवल वर्तमान पीढ़ी के ही नहीं, अपितु भावी पीढि़यों के भी पथ - प्रदर्शक, मित्र तथा दार्शनिक सलाहकार बन सकते हैं।
एक आरोप रानाडे पर बहुधा लगाया जाता है। मेरा विचार है कि उसका उत्तर दे ही दिया जाए। उनके बारे में कहा जाता है कि उनका विचार था कि भारत पर अंग्रेजों की विजय विधि का विधान थी और भारत का इससे बढ़कर हित नहीं हो सकता कि वह ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर रहे और उसी में उसकी अंतिम नियति निहित है। संक्षेप में कहा जाए तो रानाडे पर आरोप लगाया जाता है कि वह भारत की स्वाधीनता के पक्षधर नहीं थे।
आरोप के आधार हैं, रानाडे के ये उद्गार :
‘‘इसे सहज ही स्वीकार नहीं किया जा सकता कि यह विधि का विधान ही है कि असंख्य भारतवासियों के अति विशाल जनसमूह को विदेशी प्रभुत्व के प्रभावों तथा प्रतिबंधों