रानाडे, गांधी और जिन्ना
है तो वह स्वतंत्रता के नाम पर अव्यवस्था तथा विघटन को आमंत्रित करता है।
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इन सच्चाइयों का कितना अधिक महत्व है? लोग इस बात को महसूस नहीं करते कि सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक संघर्षों के सुचारु समाधान में सुरक्षा की कितनी बड़ी भूमिका होती है। जो समाज प्रगति करना चाहता है, उसमें ये संघर्ष होते ही हैं। स्वर्गीय प्रो. मेटलैंड से एक बार इस बात को स्पष्ट करने के लिए यह प्रश्न पूछा गया कि संसदीय संस्थाएं इंग्लैंड में फलीफूलीं और यूरोप में वे अपनी जड़ें जमाने में असफल रहीं, इसका क्या कारण है? उन्होंने जो उत्तर दिया, उससे सुरक्षा के महत्व का पता चलता है। उन्होंने कहा कि यह अंतर इंग्लिश चैनल के कारण है। इस उत्तर से वह यह बताना चाहते थे कि जब इंग्लैड अपनी राजनीतिक व्यवस्था में सुधार कर रहा था इंग्लिश चैनल के कारण इंग्लैंड विदेशी आक्रमण से निरापद था और इसलिए लोगों के लिए स्वतंत्रता हेतु अपने राजा के विरुद्ध लड़ना निरापद हो गया और राजा के लिए भी अपनी जनता को संघर्ष करने की अनुमति देना निरापद हो गया। सुरक्षा के इस महत्व पर अब्राहम लिंकन ने भी जोर दिया था। अमरीकी राजनीतिक संस्थाएं शाश्वत क्यों बनी रहीं, इस बात को बताते हुए लिंकन ने कहा था :
‘‘यदि यूरोप, एशिया और अफ्रीका की सभी सेनाएं एक साथ मिल जाएं और उनका सेनापति नेपोलियन बोनापार्ट हो, तब भी वे ओहियो नदी से जबरदस्ती जल की एक बूंद नहीं ले सकतीं या एक हजार वर्ष तक प्रयास करने पर भी ब्लू रिज को पार नहीं कर सकतीं।‘‘
इस उक्ति में लिंकन सामाजिक पुनर्निर्माण के लिए सुरक्षा के महत्व और उसकी आवश्यकता पर भी बल दे रहे थे। जिस प्रकार इंग्लैंड तथा अमरीका सुरक्षित देश हैं, उस प्रकार से भारत एक सुरक्षित देश नहीं है। उस तक पहुंचने के मार्ग हैं, चाहे वे मार्ग थल मार्ग हों, जल - मार्ग हों या नभ - मार्ग। चूंकि भारत की सुरक्षा नहीं है, इसलिए यह डर है कि जब भारत अपने को पुनः व्यवस्थित कर रहा होगा, तब यदि बाहर से आक्रमण हुआ तो वह टूट जाएगा। भारत जब अपने को व्यवस्थित करेगा, तब उसे सुरक्षा के रूप में निर्जल गोदी चाहिए और ब्रिटिश साम्राज्य उसके लिए एक निर्जल गोदी है। कौन कह सकता है कि रानाडे ने अपने देशवासियों को उस सुरक्षा के महत्व को बताकर बुद्धिमानी नहीं की, जिसे ब्रिटिश साम्राज्य दे सकता है और जिसकी भारत को बहुत आवश्यकता है।
पराधीन राष्ट्र प्रबल राष्ट्र के बंधन से स्वयं को छुड़ाने और अपने को स्वतंत्र घोषित करने के लिए तो सदैव आतुर रहता है। किन्तु स्वयं उस पर स्वतंत्रता का क्या प्रभाव पड़ेगा, उसके बारे में शांत मन से वह यदाकदा ही विचार करता है। तथापि इस विषय में विचार करना बहुत महत्वपूर्ण है। प्रायः यह अनुभव नहीं किया जाता कि पराधीन राष्ट्र को प्रबल राष्ट्र के साथ बांधने वाले बंधन प्रबल राष्ट्र की तुलना में पराधीन राष्ट्र के लिए अधिक आवश्यक होते हैं। यह पराधीन राष्ट्र की आंतरिक परिस्थितियों पर निर्भर होता है। पराधीन राष्ट्र एक अखंड राष्ट्र हो सकता है। पराधीन राष्ट्र में कई खंड हो सकते हैं।