270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
ये खंड ऐसे भी हो सकते हैं, जो कभी भी एकजुट नहीं होंगे। अथवा ये खंड ऐसे भी हो सकते हैं कि अभी तक तो वे एकजुट न हों, परंतु यदि उन्हें लंबे अर्से तक एक साथ रख दिया जाए तो वे एकजुट हो जाएंगे। पराधीन राष्ट्र पर बंधन तोड़ने से जो प्रभाव पड़ेगा, वह उसकी आंतरिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। जो पराधीन राष्ट्र समग्र रूप से एक इकाई है, उसके द्वारा बंधन तोड़ने से सब अच्छा ही अच्छा हो सकता है। जिस पराधीन राष्ट्र के खंड कभी एकजुट नहीं हो सकते, उसके द्वारा बंधन तोड़ने का कोई अच्छा या बुरा, किसी भी प्रकार का परिणाम नहीं हो सकता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस दृष्टिकोण से देखा जा रहा है? किन्तु तीसरे प्रकार के मामले में निश्चित रूप से
खतरा है। जहां एकीकरण वांछनीय और संभव है, वहां समय से पहले बंधन को तोड़ने से निश्चित रूप से विघटन होगा। वह एक निरर्थक कार्य होगा। यह वह दूसरा खतरा है, जिसके प्रति रानाडे अपने देशवासियों को सचेत करा चाहते थे।
यह कौन कह सकता है कि रानाडे ने इस चेतावनी को देकर बुद्धिमानी नहीं की थी? जो व्यक्ति इस चेतावनी की आवश्यकता पर शंका करना चाहते हैं, उन्हें केवल चीन की ओर देखना होगा। 30 वर्ष पहले चीन में क्रांति हुई थी। क्या चीन के लोग व्यवस्थित हो गए हैं? जी नहीं, लोग अभी तक पूछ रहे हैं, ‘‘चीनी क्रांति का चक्र कब रुकेगा।‘‘
जो व्यक्ति चीन की परिस्थितियों को जानते हैं, वे केवल यही कह सकते है, ‘‘शायद अगले सौ वर्षों में।‘‘ क्या चीन में ऐसी स्थिर सरकार स्थापित हुई है, जिसके प्रति सभी चीनियों की निष्ठा हो? स्थिति इससे बहुत भिन्न है। वास्तव में, यदि सच - सच कहा जाए तो चीन में क्रांति के बाद पहले से भी आपसी फूट है और अधिक विघटन हो गया है। क्रांति से इतनी अधिक अव्यवस्था उत्पन्न हो गई है कि उसकी स्वतंत्रता को खतरा हो गया है। इस तथ्य से इनेगिने भारतीय अवगत हैं कि यदि चीन ने क्रांति से उत्पन्न अव्यवस्था के परिणामस्वरूप अपनी स्वतंत्रता नहीं खोई है तो उसका कारण केवल यह है कि उसके शत्रु तो बहुत से थे, पर उनमें यह सहमति नहीं हुई कि उनमें से चीन को कौन निगले। चीनी क्रांति बहुत भारी भूल थी। यह युआन - शिह - काई विचार था। उन्होंने कहा था : ‘‘मुझे इस बारे में संदेह है कि क्या इस समय चीन के लोग गणतंत्र के लिए परिपक्व हैं और क्या वर्तमान परिस्थितियों में चीनी लोगों के लिए गणतंत्र को अनुकूल बना लिया गया है। सीमित राजतंत्र प्रणाली को अपनाने से परिस्थितियां फिर से तेजी से सामान्य और स्थिर हो जाएंगी। पर लोगों की प्रकृति या चीन की वर्तमान परिस्थितियों के प्रतिकूल किसी भी प्रकार की प्रायोगिक सरकार से यह लक्ष्य कहीं देरी से प्राप्त होगा। मैं वर्तमान सम्राट को इसलिए बनाए रखना चाहता हूं कि मैं संवैधानिक राजतंत्र में विश्वास करता हूं। यदि हमें इस प्रकार की सरकार रखनी है तो लोग उन्हें ही रखने के लिए सहमत होंगे ओर उसके स्थान पर किसी और को रखना नहीं चाहेंगे। इस संकट की घड़ी में मेरा एकमात्र लक्ष्य चीन को विघटन से और उसके बाद आने वाली आपदाओं से बचाना है।‘‘