6. रानाडे, गांधी और जिन्ना - Page 289

272 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

बुराइयां हैं। एक समय ऐसा था, जब उदार दल कांग्रेस का प्रतिद्धंद्धी था। आज उदार दल का कांग्रेस के साथ संबंध कुत्ते और मालिक के संबंध जैसा है। कभी - कभार कुत्ता अपने मालिक पर भौंकता है, किन्तु अपने जीवन में अधिकांश समय में वह अपने मालिक के पीछे चलने में ही संतुष्ट रहता है। उदार दल कांग्रेस की पूंछ के अलावा और क्या है? उसका अस्तित्व इतना निरर्थक हो गया है कि बहुत से लोग यह कह रहे हैं कि उदारवादी कांग्रेस में क्यों नहीं मिल जाते? रानाडे उदार दल के विध्वंस से होने वाले पश्चात्ताप को किस प्रकार पचा सकते हैं? कोई भी भारतीय किस प्रकार इस पश्चात्ताप को पचा सकता है? उदारवादियों के लिए उदार दल की विफलता एक अति दुखद घटना है। परंतु देश के लिए वास्तव में यह एक घोर अनर्थ है। एक दल का अस्तित्व लोकप्रिय सरकार के लिए इतना अधिक अनिवार्य होता है कि इसके बिना आगे बढ़ने के संबंध में सोचा ही नहीं जा सकता। अमरीका के एक प्रसिद्ध इतिहासकार ने कहा है - ‘‘अपने संवैधानिक संगठन के किसी भाग की विफलता और लिखित संविधान के एक बड़े भाग के डूबने की कल्पना करना कहीं आसान है, पर राजनीतिक समूहों के बिना आगे बढ़ने की कल्पना करना कहीं कठिन है। वे तो हमारी जीवनदायनी संस्थाएं हैं।

वास्तव में, किसी दल में नियंत्रण और अनुशासन के बिना मतदाताओं के समूह द्वारा देश पर शासन करने के प्रयास को जेम्स ब्राइस ने इस प्रकार कहा है : ‘‘यह उसी प्रकार का प्रयास है, जैसे कि शेयर धारकों के वोटों द्वारा रेलवे बोर्ड के प्रबंधन का प्रयास करना, या यात्रियों के वोटों द्वारा चलते हुए जहाज की दिशा बदलना।‘‘

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जन - सरकार के लिए दल एक अनिवार्य घटक होता है। परंतु इसी प्रकार इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि जन - सरकार के लिए एक दल का शासन घातक होता है। वास्तव में, यह तो जन - सरकार को नकारना है। इस संबंध में जर्मनी और इटली का उदाहरण सबसे संगत उदाहरण है। वहां तो सर्वसत्तावादी देशों से चेतावनी लेनी थी। कहां हम उनके पदचिह्नों पर चलने के लिए उन्हें अपना आदर्श मान रहे हैं। राष्ट्रीय एकता के नाम पर इस देश में एक दलीय प्रणाली का स्वागत किया जा रहा है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, वे एक दलीय शासन के दोषों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं, उसमें इस बात की गुंजाइश है कि अत्याचार हो और सार्वजनिक कार्यकलापों को गलत दिशा दे दी जाए। एक दलीय जन - सरकार को चलने देना लोकतंत्र को परोक्ष रूप से तानाशाही बनने की अनुमति देना है। भारत में कांग्रेस शासन के अधीन हमारा यह अनुभव रहा है कि एक दल की सरकार के शासन में बहुमत का अत्याचार किस प्रकार कोरा अत्याचार नहीं रहता और कैसे वह एक जोखिम भरा तथ्य बन जाता है। क्या श्री राजगोपालाचारी ने हमसे यह नहीं कहा था कि कार्यपालिका और न्यायपालिका का अलग - अलग होना अब आवश्यक नहीं रहा है, जैसा कि ब्रिटिश शासन में आवश्यक था? क्या यह तानाशाह के मुंह में खून लगने जैसा नहीं है? क्या तानाशाही इसलिए तानाशाही नहीं रहती कि वह निर्वाचित है? तानाशाही इसलिए भी स्वीकार्य नहीं हो जाती कि तानाशाह हमारे अपने ही भाई - बंधु हैं। तानाशाह का चयन यदि चुनाव द्वारा