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रानाडे, गांधी और जिन्ना

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किया जाए तो यह तानाशाही के विरुद्ध गारंटी नहीं है। तानाशाही के विरुद्ध वास्तविक गारंटी यही है कि उसे सत्ता से हटाने के लिए उसका मुकाबला किया जाए. उसे नीचा दिखाया जाए और उसके एक प्रतिद्वंद्व दल द्वारा उसे उखाड़ा जाए। प्रत्येक सरकार निर्णय में गलती कर सकती है, बहुत ही बुरा प्रशासन दे सकती है, भ्रष्टाचार, अन्याय और दमन व अत्याचार तथा प्रतिष्ठा के कार्य कर सकती है। कोई भी सरकार आलोचना से मुक्त नहीं होनी चाहिए। किन्तु सरकार की आलोचना कौन कर सकता है? यदि यह बात व्यक्तियों पर छोड़ दी जाए तो आलोचना कौन कर सकता है। सर टोंबी यह सलाह दे गए हैं कि किसी व्यक्ति को अपने शत्रु से किस प्रकार निबटना चाहिए? उन्होंने कहा था, ‘‘जैसे ही तुम उसे देखों, वैसे ही उसे तुरंत खींच लो और जैसे ही खींचों उस पर भयंकर रूप से दहाड़ों‘‘।

परंतु इस सलाह पर अमल करना उस व्यक्ति के लिए संभव नहीं, जो सरकार के विरुद्ध लड़ना चाहता है। ऐसी बहुत सी बातें हैं जो व्यक्तियों के विरुद्ध इस भूमिका को सफलतापूर्वक निभा रही हैं। ब्राइस के अनुसार एक तो यह है कि विशाल जनसमूह भाग्यवादी है। व्यक्तिगत प्रयास की महत्ता न होने के कारण उनमें मौन स्वीकृति तथा समर्पण की प्रवृत्ति है। वे अपने को असहाय समझते हैं, क्योंकि उनका विश्वास है कि मनुष्य के कार्यकलापों का संचालन तो बड़ी शक्तियां करती हैं और उनकी धारा को व्यक्ति अपने प्रयास से नहीं मोड़ सकता। दूसरे, बहुसंख्यकों के अत्याचार की संभावना होती है। उन व्यक्तियों का जो बहुमत के पीछे नहीं चलते, प्रायः उनका दमन किया जाता है, उन्हें दंड दिया जाता है और उन्हें अन्य सामाजिक असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। कांग्रेस के शासन में हममें से कुछ लोगों को इसका पर्याप्त अनुभव मिल चुका है। तीसरे, सीआईडी का भय है। गेस्टापों तथा अन्य सभी साधन आलोचकों पर निगरानी रखने तथा उन्हें शांत करने के लिए सरकार के पास मौजूद हैं।

स्वतंत्रता रहस्य है साहस का और साहस व्यक्तियों द्वारा एक दल में बंध जाने से उत्पन्न होता है। सरकार को चलाने के लिए दल अनिवार्य होता है। किन्तु सरकार निरंकुश न हो जाए, इसके लिए दो दलों का होना अनिवार्य है। एक लोकतांत्रिक सरकार तभी लोकतांत्रिक रह सकती है, जब कि वहां दो दिल हों, अर्थात सत्तारूढ़ दल ओर दूसरा विरोधी दल। जैसा कि जेनिंग्स ने कहा है : ‘‘यदि विपक्ष नहीं है तो लोकतंत्र भी नहीं है। महामहिम का विपक्ष कोई निरर्थक उक्ति नहीं होती। महामहिम को विपक्ष भी चाहिए तथा सरकार भी।‘‘

इन विचारों के परिप्रेक्ष्य में इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि भारत में उदार दल की विफलता एक बड़ा अनर्थ नहीं है? उदार दल के पुनरुज्जीवन या एक अन्य दल के निर्माण के बिना, स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का परिणाम यह होगा कि स्वतंत्रता छिन जाएगी क्योंकि तानाशाही और स्वतंत्रता के बीच सांप और न्योले जैसा बैर होता है, चाहे तानाशाही देशी हो या विदेशी। यह खेद का विषय है कि भारतीय लोगों ने इस तथ्य की उपेक्षा की है। परंतु मुझे इस बात में संदेह नहीं कि जो लोग यह चिल्लाते हैं कि केवल कांग्रेस ही एकमात्र पार्टी है और कांग्रेस ही राष्ट्र है, उनको अपने इस निर्णय पर पछताना पड़ेगा।