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रानाडे, गांधी और जिन्ना

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है। इसके लिए दल को दो कार्य करने चाहिएं। पहला काम यह है कि उसे जनता के साथ अपना संपर्क रखना चाहिए। वह जनता के बीच में जाए और उसको अपने सिद्धांतों, नीतियों, विचारों तथा उम्मीदवारों के विषय में जानकारी दें। दूसरा काम यह है कि उसे चाहिए कि वह अपने माल, अर्थात अपनी बातों के पक्ष में प्रचार करें। उसे चाहिए कि वह उनके संबंध में जनता को पूरी तरह से जानकारी देकर उनके प्रति उसे जागरूक करे। पुनः ब्राइस के शब्दों में - ‘‘मतदाताओं को उन राजनीतिक मसलों की जानकारी दीजिए, जिनके बारे में उन्हें निर्णय करना है, उन्हें अपने नेताओं के विषय में सूचना दीजिए तथा अपने विरोधियों के दोषों तथा अपराधों को बताइए।‘‘ ये बुनियादी बाते हैं, जिनसे संगठित प्रयास का श्रीगणेश हो सकता है। जो दल संगठित प्रयास करने में असफल रहता है, उसे स्वयं को दल कहने का कोई अधिकार नहीं होता।

उदार दल ने एक संगठन के रूप में इनमें से कौन सा कार्य किया है। उदार दल के पास केवल उच्च कमान है। उसके पास कोई तंत्र न होने के कारण उच्च कमान केवल एक छाया मात्र है। उसका अनुयायी वर्ग केवल उस संकेन्द्रित मंडल तक ही सीमित होता है, जिसमें परंपरा के बंधनों से बंधे लोग होते हैं। नेताओं के पास ऐसा कुछ नहीं होता, जिससे वे लोगों के अंदर भावात्मक निष्ठा उत्पन्न कर सकें। भीड़ को एकत्रित करने के लिए उनके पास युद्ध का नारा नहीं होता। उदार दल का जन - संपर्क में विश्वास नहीं है। एक ऐसे दल के विषय में कल्पना नहीं की जा सकती, जो मुख्य जनधारा से नितांत अलग - थलग हो। वह धर्म - परिवर्तन में विश्वास नहीं करता। यह बात नहीं है कि प्रचार करने के लिए उसके पास कोई सिद्धांत नहीं है, लेकिन हिन्दू धर्म की भांति वह धर्मांतरण निरपेक्ष पंथ है। सिद्धांतों तथा नीतियों को सूत्रबद्ध करने में उसका विश्वास है। परंतु वह उन्हें कार्यान्वित करने का प्रयास नहीं करता। प्रचार तथा संगठित प्रयास उदार दल के लिए वर्जनाएं हैं। वे व्यक्तिगत स्तर पर आवाज उठाते हैं। वे सालाना बैठकें करते हैं। जब क्रिप्स जैसा कोई व्यक्ति आता है अथवा जब वाइसराय महत्वपूर्ण व्यक्तियों को आमंत्रित करता है तो वे आमंत्रण के लिए भाग - दौड़ करते हैं। बस यही सीमा है, उनकी राजनीतिक गतिविधि की।

यदि उदार दल की बदनामी हुई है तो क्या इसमें कोई आश्चर्य हैं? उदार दल सबसे महत्वपूर्ण इस तथ्य को भूल गया है कि किसी भी उद्देश्य की पूर्ति के लिए संगठन का होना अनिवार्य है और विशेष रूप से राजनीति में तो बहुत ही अनिवार्य है, जहां अनेक परस्पर विरोधी तत्वों को व्यवहारिक एक - सूत्रता में बांधना बहुत ही महत्वपूर्ण होता है।

भारत में उदार दल की इस विफलता के लिए कौन उत्तरदायी है? तथापि, हमें इस बात को कहने का बहुत खेद है और मेरा विचार है कि हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि इस विफलता का उत्तरदायित्व किसी हद तक रानाडे पर भी है। रानाडे का संबंध विशिष्ट वर्गों से था। उनका जन्म तथा पालनपोषण उनके अंदर ही हुआ था। वह कभी भी जनता के