30 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय एक संगठन है, जिसका एकमात्र उद्देश्य हिन्दुओं में जातिप्रथा का उन्मूलन करना है। सैद्धांतिक रूप से मैं ऐसे किसी आंदोलन में भाग लेना पसंद नहीं करता, जो सवर्ण हिन्दुओं द्वारा चलाया गया हो। सामाजिक सुधार के प्रति उनका रवैया मुझसे इतना भिन्न है कि मेरे लिए उनके साथ काम करना कठिन है। वास्तव में, मेरे और उनके विचारों में विभिन्नताओं के कारण मुझे उनके साथ काम करना अनुकूल नहीं लगता। इसलिए जब मंडल ने पहली बार मुझसे अध्यक्षता करने का अनुरोध किया था तो मैंने उसे अस्वीकार कर दिया था। फिर भी, मंडल ने इसे मेरी अस्वीकृति नहीं माना और अपने एक सदस्य को मुझ पर निमंत्रण स्वीकार करने के लिए दबाव डालने के उद्देश्य से बंबई भेजा। अंत में, मैं अध्यक्षता करने के लिए तैयार हो गया। वार्षिक सम्मेलन मंडल के मुख्यालय लाहौर में होना था। सम्मेलन का आयोजन ईस्टर के अवसर पर होना था, किन्तु बाद में इसे 1936 के मई मास के मध्य तक के लिए स्थगित कर दिया गया। मंडल की स्वागत समिति ने अब इस सम्मेलन को रद्द कर दिया है। इस सम्मेलन के रद्द होने की सूचना मेरे अध्यक्षीय भाषण के छप जाने के बहुत बाद में आई। इस भाषण की प्रतियां अब मेरे पास पड़ी हैं। चूंकि मुझे अध्यक्षीय पद से यह भाषण देने का अवसर नहीं मिला, इसलिए जनता को जातिप्रथा से उत्पन्न समस्याओं पर मेरे विचारों को जानने का अवसर नहीं मिल सका। जनता मेरे विचारों को जान
सके और भाषण की जो छपी प्रतियां मेरे पास पड़ी हैं उनका सदुपयोग हो सके, इस उद्देश्य से मैंने छपी प्रतियों को बाजार में बेच देने का फैसला किया है। संलग्न पृष्ठों
में उसी भाषण का मूल पाठ है।
जनता को यह जानने की जिज्ञासा होगी कि किन कारणों से सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में मेरी नियुक्ति को रद्द किया गया। शुरू में भाषण की छपाई को लेकर विवाद
भाषण लाहौर में छपे, क्योंकि वहां छापने में बचत होगी। मैं इस पर सहमत नहीं हुआ और मैंने इसे बंबई में ही छापे जाने का आग्रह किया। मेरे प्रस्ताव पर सहमति बजाए,
मुझे एक पत्र प्राप्त हुआ, जिस पर मंडल के कई सदस्यों के हस्ताक्षर थे। इसमें से
आगे दिए गए उद्धरण मैं यहां प्रस्तुत करता हूं :
27 - 3 - 36 सम्मानीय डाक्टर जी,
श्री संत राम को लिखे गए इस मास की 24 तारीख के आपके पत्र को हमें दिखाया गया है। हमें इसे पढ़कर थोड़ी निराशा हुई। यहां जो स्थिति उत्पन्न हुई है, शायद आप इससे पूरी तरह अवगत नहीं हैं। पंजाब के प्रायः सभी हिन्दू आपको इस प्रांत में आमंत्रित किए जाने के विरुद्ध हैं। जातपांत तोड़क मंडल की बड़ी तीखी आलोचना हुई है और सभी ओर से झाड़ - फटकार मिली है। सभी हिन्दू नेताओं ने जिनमें भाई परमानंद, एम.एल.ए. (हिन्दू महासभा के पूर्व अध्यक्ष), महात्मा हंसराज, डॉ. गोकल चंद नारंग (स्थानीय स्वशासन मंत्री), राजा नरेन्द्र नाथ, एम.एल.सी, आदि शामिल हैं, मंडल के इस निर्णय से अपने आपको अलग कर लिया है।