जातिप्रथा - उन्मूलन
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पुनःश्च, कृपया भाषण के छपते ही तत्काल उसकी प्रतियां यात्री गाड़ी से भेज दें, ताकि उन प्रतियों को प्रकाशन के लिए समाचार - पत्रों को भेज दिया जाए। तदनुसार मैंने एक हजार प्रतियां छापने के आदेश के साथ अपनी पांडुलिपि मुद्रक
को सौंप दी। आठ दिन के बाद मुझे श्री हर भगवान का एक और पत्र प्राप्त हुआ,
जिसकी प्रतिलिपि नीचे प्रस्तुत है :
लाहौर,
22.4.36
प्रिय डाक्टर अम्बेडकर,
हमें आपका तार और पत्र प्राप्त हुआ। इसके लिए कृपया हमारा धन्यवाद स्वीकार करें। आपकी इच्छानुसार हमने सम्मेलन को फिर स्थगित कर दिया है, किन्तु हम महसूस करते हैं कि इसे 25 तथा 26 तारीख को आयोजित करना अधिक बेहतर होगा, क्योंकि पंजाब में मौसम दिन - प्रतिदिन गर्म होता जा रहा है। मई के मध्य में यहाँ बहुत गर्म हो जाएगा और दिन के समय बैठकें करना बहुत सुखद है और आरामदायक नहीं रहेगा। फिर भी, यदि यह सम्मेलन मई के मध्य में होता है तो हम इसे यथासंभव आरामदायक बनाने के लिए भरसक प्रयत्न करेंगे।
किन्तु एक बात है, जिसे हम आपकी जानकारी में लाने के लिए विवश हैं। आपको याद होगा कि जब मैंने धर्म - परिवर्तन के विषय पर आपकी घोषणा के संबंध में अपने कुछ लोगों द्वारा उठाई आशंकाओं की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया था तो आपने बताया था कि यह बात निःसंदेह मंडल के कार्यक्षेत्र से बाहर है और उसके संबंध में आपका हमारे मंच से कुछ भी कहने का इरादा नहीं है। इसके साथ ही जब आपने भाषण की पांडुलिपि मुझे दी तो आपने आश्वासन दिया था कि वही आपके भाषण का मुख्य अंश है और आप केवल दो या तीन अंतिम पैरे उसमें जोड़ना चाहते हैं। आपके भाषण की दूसरी किस्त मिलने पर यह देखकर हम दंग रह गए कि यह भाषण इतना लंबा हो जाएगा कि बहुत कम लोग ही इस सारे भाषण के पढ़ना चाहेंगे। इसके अलावा, आपने अपने भाषण में एक से अधिक बार यह कहा है कि मैंने हिन्दू समाज से अलग होने का निर्णय कर लिया है और एक हिन्दू के रूप में यह मेरा अंतिम भाषण है। आपने अनावश्यक रूप से वेदों और हिन्दुओं के अन्य धार्मिक ग्रथों की नैतिकता तथा उनके औचित्य पर प्रहार किया है और हिन्दू धर्म के तकनीकी पक्ष पर विस्तारपूर्वक चर्चा की है, जिनका विवादास्पद समस्या से कतई कोई संबंध नहीं है। इससे कुछ परिच्छेद तो असंगत और अप्रासंगिक हो गए हैं। यदि आप अपने भाषण को उसी अंश तक सीमित रखते, जो आपने मुझे दिया था या अगर उसमें कोई वृद्धि करना आवश्यक ही था तो वह भी वहीं तक सीमित रहती, जो आपने ब्राह्मणवाद आदि पर लिखा है, तो इससे