34 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
हमें बड़ी प्रसन्नता होगी। अंतिम अंश जो हिन्दू धर्म के पूर्ण उन्मूलन के संबंध में है और हिन्दुओं के पवित्र ग्रंथों की नैतिकता पर संदेह व्यक्त करता है तथा हिन्दू समाज को छोड़ देने के आपके इरादे की ओर संकेत करता है, मुझे संगत प्रतीत नहीं होता।
अतः मैं सम्मेलन के लिए उत्तरदायी लोगों की ओर से बड़ी विनम्रता के साथ आपसे अनुरोध करता हूं कि आप ऊपर संदर्भित परिच्छेदों को छोड़ दें और भाषण को वहीं समाप्त कर दें, जहां तक आपने मुझे दिया था, या आप चाहें तो ब्राह्मणवाद तक कुछ पैरे उसमें जोड़ दें। हम नहीं समझते कि भाषण को अनावश्यक रूप से उत्तेजनात्मक और कष्टकारी बनाने में कोई बुद्धिमानी है। हममें से कई लोग आपकी भावनाओं का समर्थन करते हैं और हिन्दू धर्म के पुनर्निर्माण हेतु आपका मार्गदर्शन चाहते हैं। यदि आप अपने विचारों के लोगों को आपस में मिलाने का निर्णय करते तो बड़ी संख्या में लोग आपके सुधारवादी कार्यकर्ताओं में शामिल हो जाते।
वास्तव में, हमने सोचा था कि आप जातिप्रथा की बुराइयों को समाप्त करने में हमारा मार्ग - दर्शन करेंगे, विशेषकर जब आपने इस विषय का इतना गहन अध्ययन किया है। हमारा विचार था कि आप एक क्रांति लाकर इस दिशा में किए जा रहे महान प्रयासों के केंद्र बिन्दु बनकर हमारे हाथ मजबूत करेंगे, किन्तु आपने घोषणा जिस रूप में की है, उसके दोहराए जाने से इसकी शक्ति समाप्त हो जाती है और यह एक घिसी - पिटी चीज बनकर रह जाती है। ऐसी परिस्थितियों में मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि आप सारे मामले पर फिर से विचार करें और यह कहकर अपने भाषण को अधिक प्रभावी बनाएं कि ‘यदि हिन्दू लोग जातिप्रथा को समाप्त करने की दिशा में ईमानदारी से काम करने के इच्छुक हैं, चाहे उन्हें इसके लिए अपने सगे - संबंधियों और धार्मिक मान्यताओं को ही तिलांजलि क्यों न देनी पड़े, तो मुझे इस कार्य की अगुवाई करने में प्रसन्नता होगी।‘ यदि आप ऐसा करते हैं तो मुझे आशा है कि आपको ऐसे प्रयास में पंजाब से तत्काल अनुकूल प्रतिक्रिया प्राप्त होगी।
यदि आप ऐसे समय पर हमारी सहायता करेंगे तो मैं आपका आभारी रहूंगा, क्योंकि हम पहले ही भारी खर्च कर चुके हैं और बड़े असमंजस की स्थिति में हैं। कृपया हमें वापसी डाक से सूचित करें कि क्या आपने भाषण को उपर्युक्तानुसार सीमित करने की कृपा की है। यदि आप फिर भी भाषण को संपूर्ण रूप में छापने का आग्रह करते हैं, तो हमें खेद है कि हमारे लिए सम्मेलन का आयोजन करना संभव और कदाचित उपयुक्त नहीं होगा और हम चाहेंगे कि इसे अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया जाए। हालांकि ऐसा करने में हमें लोगों की सद्भावना से हाथ धोना पड़ेगा, क्योंकि यह सम्मेलन बार - बार स्थगित करना पड़ा है। फिर भी, हम यह उल्लेख करना चाहते हैं कि आपने जातिप्रथा पर ऐसा बढि़या प्रबंध लिखकर हमारे हृदय में एक स्थान बना लिया है। मैं कह सकता हूं कि यह अब तक लिखे गए अन्य सभी शोध प्रबंधों से बढ़कर है और यह एक मूल्यवान विरासत के रूप में सिद्ध होगा। आपने इसके तैयार करने में