जातिप्रथा - उन्मूलन
जो कष्ट उठाया है, उसके लिए हम सदा आपके ऋणी रहेंगे। आपकी कृपा के लिए बहुत - बहुत धन्यवाद। शुभकामनाओं सहित,
इस पत्र के उत्तर में मैंने जो उत्तर भेजा, वह इस प्रकार है :
प्रिय श्री हर भगवान,
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आपका हर भगवान
27 अप्रैल, 1936
मुझे आपका 22 अप्रैल का पत्र प्राप्त हुआ। मुझे खेद है कि यदि मैंने अपने भाषण को संपूर्ण रूप में छापे जाने का आग्रह किया तो जातपांत तोड़क मंडल की स्वागत समिति ‘‘सम्मेलन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर देगी‘‘। इसके उत्तर में मैं सूचित करना चाहता हूं कि यदि मंडल मेरे भाषण में अपनी परिस्थितियों के अनुकूल काट - छांट करने पर जोर देगा तो मैं भी सम्मेलन को रद्द कराना चाहूंगा। मैं अस्पष्ट शब्दों का प्रयोग करना पसंद नहीं करता। आप मेर इस निर्णय को पसंद नहीं करेंगे, किन्तु मैं सम्मेलन की अध्यक्षता करने के सम्मान की खातिर उस आजादी का परित्याग नहीं कर सकता, जो प्रत्येक अध्यक्ष को अपने भाषण को तैयार करने में मिलनी चाहिए। मैं मंडल को खुश करने के लिए अपने उस कर्तव्य को भी तिलांजलि नहीं दे सकता, जो किसी सम्मेलन की अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति को सही और उचित मार्गदर्शन करने के लिए प्राप्त होती है। यह एक सिद्धांत का प्रश्न है और मैं महसूस करता हूं कि मुझे किसी भी प्रकार से इससे समझौता नहीं करना चाहिए।
स्वागत समिति ने जो निर्णय लिया है, मैं उसके औचित्य के बारे में किसी विवाद में नहीं पड़ता चाहता था, किन्तु चूंकि आपने ऐसे कुछ कारण दिए हैं जिनसे मुझ पर दोष आरोपित होता है, इसलिए मै उनका उत्तर देने के लिए बाध्य हूं। सर्वप्रथम, मुझे उस धारणा को दूर कर देना चाहिए कि भाषण के उस अंश में व्यक्त विचार, जिन पर समिति ने आपत्ति की हैं, मंडल के सामने अचानक ही उपस्थित हुए हैं। मुझे विश्वास है कि श्री संत राम इस बात की पुष्टि करेंगे। मेरा कहना है कि उनके एक पत्र के उत्तर में मैंने कहा था कि जातिप्रथा को तोड़ने का वास्तविक तरीका अंतर्जातीय भोज और अंतर्जातीय विवाह नहीं है, बल्कि उन धार्मिक धारणाओं को नष्ट करना है, जिन पर जातिप्रथा की नींव रखी गई है और श्री संत राम ने इसके प्रत्युत्तर में मुझसे उस बात को स्पष्ट करने को कहा था और माना था कि यह एक नवीन दृष्टिकोण है। श्री संत राम के इस अनुरोध के उत्तर में मैंने सोचा कि उनको लिखे गए अपने पत्र के एक वाक्य में जो बात मैंने कही थी, उसे अपने भाषण में विस्तार से समझा देना चाहिए। इसलिए