36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
आप यह नहीं कह सकते कि जो विचार मैंने व्यक्त किए हैं, वे नए हैं। किसी भी प्रकार से ये विचार श्री संत राम, जो आपके मंडल की जान और उसके प्रमुख मार्गदर्शक हैं, के लिए नए नहीं हैं, परंतु मैं इससे भी आगे यह कहता हूं कि मैंने अपने भाषण का यह अंश केवल इसलिए नहीं लिखा है कि मैंने ऐसा करना वांछनीय समझा है, बल्कि इसलिए लिखा है कि तर्क को पूरा करने के लिए ऐसा करना नितांत आवश्यक है। मुझे यह पढ़कर आश्चर्य हुआ कि भाषण के जिस अंश पर आपकी समिति को आपत्ति है, उसे आप ‘‘अंसगत और अप्रासंगिक‘‘ बताते हैं। मैं बताना चाहता हूं कि मैं एक वकील हूं और प्रासंगिकता के नियमों को उतनी अच्छी तरह जानता हूं, जितना आपकी समिति का कोई सदस्य जानता है। मैं जोर देकर कहता हूं कि जिस अंश पर आपत्ति की गई है, वह न केवल सबसे अधिक प्रासंगिक है, बल्कि महत्वपूर्ण भी है। भाषण के उसी अंश में मैंने जातिप्रथा को नष्ट करने के सर्वोत्तम उपायों का विवेचन किया है। यह हो सकता है कि मैं जातिप्रथा को नष्ट करने के सर्वोत्तम उपाय के रूप में जिस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं, वह चौंकाने वाला और कष्टकारी हो। आपको यह कहने का अधिकार है कि मेरा विश्लेषण गलत है। किन्तु आप यह नहीं कह सकते कि जातिप्रथा की समस्या से संबंधित किसी भाषण में मुझे इस बात की छूट नहीं है कि मैं इस मुद्दे पर विचार करूं कि जातिप्रथा को कैसे नष्ट किया जा सकता है।
आपकी अन्य शिकायत भाषण की लंबाई को लेकर है। मैंने स्वयं भाषण में ही इस आरोप के दोष को स्वीकार किया है। किन्तु इसके लिए वास्तविक जिम्मेदार कौन है? मुझे खेद है कि आप से देर में संपर्क हुआ, नहीं तो आपको इस बात की जानकारी हो जाती कि मूल रूप से मैंने अपनी ही सुविधा के लिए एक संक्षिप्त भाषण लिखा था, क्योंकि एक विस्तृत शोध - प्रबंध तैयार करने का न तो मेरे पास समय ही था, और न ही शक्ति थी। मंडल ने ही मुझसे इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डालने का अनुरोध किया था और मंडल ने ही जातिप्रथा के संबंध में प्रश्नों की एक सूची मुझे दी थी तथा मुझसे अनुरोध किया था कि मैं अपने भाषण में इनका उत्तर दूं, क्योंकि प्रायः इन्हीं प्रश्नों को मंडल तथा उसके विरोधियों के बीच विवाद में उठाया जाता है और मंडल को इनका संतोषजनक उत्तर देने में कठिनाई होती है। इस संबंध में मंडल की इच्छाओं की पूर्ति करने के प्रयास में भाषण इस सीमा तक लंबा हो गया है। जो कुछ मैंने कहा है, उसे देखते हुए मुझे विश्वास है कि आप इस बात से सहमत होंगे कि भाषण के लंबा होने का दोष मेरा नहीं है।
मुझे यह आशा नहीं थी कि आपका मंडल इससे इतना परेशान होगा, क्योंकि मैंने हिन्दू धर्म के विनाश की बात कही है। मैं समझता था कि केवल मुर्ख ही शब्दों से घबराते हैं। किन्तु ऐसा न हो कि लोगों के मन में कोई गलत धारणा उत्पन्न हो, इसके लिए मैंने इस बात को स्पष्ट करने का भारी प्रयास किया है कि धर्म और धर्म के विनाश