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जातिप्रथा - उन्मूलन

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से मेरा क्या अभिप्रायः है। मुझे विश्वास है कि मेरा भाषण पढ़ने के बाद कोई भी व्यक्ति मुझे गलत नहीं समझ सकेगा। साथ में दिए गए स्पष्टीकरण के बावजूद आपका मंडल मात्र ‘धर्म के विनाश आदि‘ शब्दों से इतना भयभीत हो गया, इससे मंडल के प्रति मेरी श्रद्धा में कोई वृद्धि नहीं हुई। ऐसे व्यक्तियों के प्रति किसी को भी कोई श्रद्धा या सम्मान नहीं हो सकता, जो सुधारक बनकर भी उस स्थिति के तर्कपूर्ण परिणामों को देखना भी पसंद नहीं करते। इन्हें अकेला ही चलने दो।

आप मानेंगे कि मैंने अपने भाषण को तैयार करने में किसी भी प्रकार से सीमित होना कभी स्वीकार नहीं किया और इस प्रश्न पर कि भाषण में क्या होना चाहिए और क्या नहीं, मेरे और मंडल के बीच विचार - विमर्श नहीं हुआ। मैं सदा यह मानकर चला हूं कि मैं अपने भाषण में उस विषय पर अपने विचारों को व्यक्त करने में स्वतंत्र हूं। वास्तव में, 9 अप्रैल को बंबई में आपके आने तक मंडल को यह पता नहीं था कि किस प्रकार का भाषण तैयार कर रहा हूं। आप जब बंबई आए तो मैंने स्वेच्छा से बताया था कि मुझे इस बात की कोई इच्छा नहीं है कि मैं दलित जातियों द्वारा धर्मांतरण के संबंध में अपने विचारों की वकालत करने के लिए मंच का उपयोग करूं। मैं समझता हूं कि मैंने भाषण को तैयार करने में ईमानदारी से उस वायदे को निभाया है। अप्रत्यक्ष रूप से एक सरसरी तौर पर दिए गए इस संदर्भ के अलावा कि ‘मुझे अफसोस है कि मै। यहां नहीं रहूंगा .......आदि‘, मैंने अपने भाषण में विषय के बारे में कुछ नहीं कहा है। जब मैं यह देखता हूं कि आपको इस प्रकार के सरसरी और इतने अप्रत्यक्ष संदर्भ पर भी आपत्ति है तो मैं यह प्रश्न पूछने के लिए बाध्य हूं कि क्या आपने यह सोचा है कि मैं आपके सम्मेलन की अध्यक्षता करने की खातिर दलित वर्गों द्वारा धर्म - परिवर्तन संबंधी अपने विचारों को छोड़ने या स्थगित रखने के लिए सहमत हो जाऊंगा? यदि आपने ऐसा सोचा है; तो मैं आपसे कहूंगा कि यह आपकी भूल है और इसके लिए मैं किसी भी प्रकार से जिम्मेदार नहीं हूं। यदि आपमें से कोई इस बात का संकेत भी कर देता है कि आप मुझे अध्यक्ष चुनकर जो सम्मान दे रहे हैं, उसके बदले में मुझे धर्म - परिवर्तन के अपने कार्यक्रम में अपने विश्वास का संत्याग करना पड़ेगा, तो मैं आपको स्पष्ट शब्दों में बता देता कि मुझे आपके द्वारा दिए जाने वाले किसी सम्मान की अपेक्षा, अपने विश्वास की कहीं अधिक परवाह है।

आपके 14 तारीख के पत्र के बाद आपका यह पत्र मेरे लिए एक आश्चर्य है। मुझे विश्वास है कि जो कोई भी इन्हें पढ़ेगा, ऐसा ही महसूस करेगा। स्वागत समिति द्वारा इस प्रकार के अचानक अपने रुख में परिवर्तन करने के लिए मैं उत्तरदायी नहीं हो सकता। जब 14 तारीख को आपने पत्र लिखा था तो उस समय समिति के सामने जो कच्चा प्रारूप था, उसमें और अंतिम प्रारूप, जिस पर आपने अपने पत्र में स्वागत समिति का निर्णय सूचित किया था, के सार रूप में कोई अंतर नहीं है। आप अंतिम प्रारूप