2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 55

38 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

में एक भी ऐसा नया विचार नहीं बता सकते, जो पहले वाले प्रारूप में न हो। वे ही समान विचार हैं। अंतर केवल यह है कि उन्हें अंतिम प्रारूप में अधिक विस्तार के साथ रखा गया है। यदि भाषण में कोई आपत्तिजनक बात थी तो आप उसे 14 तारीख को बता सकते थे। किन्तु आपने ऐसा नहीं किया। उल्टे आपने मुझसे एक हजार प्रतियां छपवाने के लिए कहा और यह बात मुझ पर छोड़ दी कि मैं आपके द्वारा सुझाए गए मौलिक परिवर्तनों को स्वीकार करूं या न करूं। तदनुसार, मैंने एक हजार प्रतियां छपवा लीं, जो अब मेरे पास पड़ी हैं। आठ दिन बाद आप यह बताने के लिए लिखते हैं कि आपको भाषण पर ऐतराज है और यदि उसमें संशोधन नहीं किया गया, तो सम्मेलन रद्द कर दिया जाएगा। आपको ज्ञात होना चाहिए था कि भाषण में परिवर्तन की केई आशा नहीं है। जब आप बंबई में थे तो मैंने आपको बताया था कि मैं उसमें एक विराम का भी परिवर्तन नहीं करूंगा और अपने भाषण को किसी भी तरह सेंसर किए जाने की अनुमति नहीं दूंगा। आपको मेरे भाषण को जैसा वह मेरे पास से आयेगा, वैसा ही स्वीकार करना होगा। मैंने आपको यह भी कहा था कि भाषण में व्यक्त विचारों की जिम्मेदारी पूर्णतः मेरी होगी और यदि सम्मेलन उन्हें पसंद नहीं करेगा और उनकी निंदा करने का प्रस्ताव पास करेगा कोई हर्ज न होगा। मैं आपके मंडल को अपने विचारों की जिम्मेदारी के भार से मुक्त करने और, साथ ही अपने आपको सम्मेलन के साथ अधिक न उलझाने के लिए इतना आतुर था कि मैंने आपको सुझाव दिया था कि मेरी इच्छा है कि मेरे भाषण को अध्यक्षीय भाषण के रूप में नहीं, बल्कि उद्घाटन भाषण के रूप में माना जाए और मंडल की अध्यक्षता के लिए किसी और व्यक्ति की तलाश कर लें तथा प्रस्तावों से निबट लें। 14 तारीख को आपकी समिति के अलावा और कोई भी व्यक्ति निर्णय लेने की बेहतर स्थिति में नहीं था। किन्तु समिति ऐसा नहीं कर सकी और इस दौरान मुझे छपाई की लागत उठानी पड़ गई, जिसे मुझे विश्वास है कि आपकी समिति को थोड़ी अधिक दृढ़ता से बचाया जा सकता था।

मेरा विश्वास है कि मेरे भाषण में जो विचार व्यक्त किए गए हैं, उनकी आपकी समिति से कोई लेना - देना नहीं है। अनेक कारणों से मुझे विश्वास करना पड़ रहा है कि अमृतसर में आयोजित सिख प्रचार कांग्रेस में मेरी मौजूदगी, स्वागत समिति द्वारा किए गए निर्णय का एक बड़ा कारण थी। समिति ने 14 और 22 अप्रैल के बीच अपने रुख में जो अचानक परिवर्तन किया, उसका और कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं हो सकता। फिर भी, मैं अब इस विवाद के अधिक लंबा नहीं खींचना चाहता और आपसे अनुरोध करता हूं कि आप तत्काल घोषणा कर दें कि मेरी अध्यक्षता में होने वाले सम्मेलन का अधिवेशन रद्द हो गया है। अब सारी गरिमा समाप्त हो चुकी है और यदि आपकी समिति मेरे भाषण को इसके वर्तमान संपूर्ण रूप में स्वीकार करने के लिए सहमत भी हो जाए, तब भी मैं इसकी अध्यक्षता नहीं करूंगा। भाषण तैयार करने में उठाए गए मेरे कष्टों के लिए आपने जो सराहना की है, उसके लिए मैं धन्यवाद देता हूं। अगर किसी को नहीं तो मुझे इस श्रम से निश्चय ही लाभ मिला है। मुझे खेद