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जातिप्रथा - उन्मूलन

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उन्हें अच्छा नागरिक बनाने का कोई प्रयास ही नहीं किया। अब मान लें कि कोई हिन्दू भी इन मूल निवासियों के लिए वह सब कुछ करना चाहता है, जो ईसाई प्रचारक कर रहा है तो क्या वह वैसा कर पाता? मैं कहता हूं, नहीं। मूल निवासियों को सभ्य बनाने का आशय होगा, अपने ही लोगों की तरह उन्हें अपना बनाना, उनके बीच जाकर रहना और उनके बीच बंधुता की भावना विकसित करने की कोशिश करते रहना। किसी हिन्दू के लिए ऐसा करना कैसे संभव है? उसकी पूरी जिंदगी अपनी जाति को बनाए रखने की भरसक कोशिश तक ही सीमित है। जाति ही उसकी वह अमूल्य निधि है, जिसकी उसे हर कीमत पर रक्षा करनी है। उसे यह कभी सहन नहीं हो सकता कि वह उस निधि को उन मूल आदिम जातियों से संपर्क करने में गंवा दे, जिन्हें वैदिक - काल से ही नीच अनार्यों का अंश माना जाता रहा है। ऐसा नहीं है कि हिन्दुओं को पतित मानवता के उत्थान की कर्तव्य - भावना सिखाई ही नहीं जा सकती। लेकिन कठिनाई यह है कि चाहे उनमें कितनी ही कर्तव्य - भावना क्यों न भर दी जाए, उनकी अपनी जाति की रक्षा की उनकी कर्तव्य - भावना उन पर हमेशा विजय पा लेगी। इसलिए जाति ही वह मुख्य स्पष्टीकरण है, जिसके कारण हिन्दुओं ने स्वयं सभ्य हो जाने के बावजूद जंगली जातियों को जंगली ही बने रहने दिया है और इसमें उन्हें न तो लज्जा का अनुभव होता है, न ही बुरा लगता है और न कोई पश्चात्ताप होता है। हिन्दू यह नहीं समझ पाए हैं कि इन मूल निवासियों से उन्हें कभी खतरा हो सकता है। अगर ये जंगली लोग जंगली ही बने रहे, तो शायद उनसे हिन्दुओं को कोई खतरा न हो। लेकिन अगर गैर - हिन्दू उन्हें अपना लें और अपने धर्म में उनका धर्म - परिवर्तन कर लें, तो हिन्दुओं के शत्रुओं की संख्या बढ़ जाएगी। अगर ऐसा हुआ तो उसका कारण स्वयं हिन्दू लोग और उनकी जातिप्रथा होगी।

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हिन्दुओं ने न केवल वन्य जातियों को सभ्य बनाने का मानवतावादी कार्य करने का कोई प्रयास नहीं किया, बल्कि ऊंची जाति वाले हिन्दुओं ने जान - बूझकर हिन्दू समाज की निचली जातियों को ऊंची जाति के सांस्कृतिक स्तर पर ऊपर उठने की मोहलत नहीं दी। मैं उसके दो उदाहरण देता हूं : एक है सुनार समुदाय जाति और दूसरा पाठारे प्रभु समुदाय। ये दोनों ही समुदाय महाराष्ट्र में काफी मशहूर हैं। ये दोनों ही समुदाय ब्राह्मणों के तौर - तरीकों और आदतों को अपनाने की कोशिश करते हुए अपनी सामाजिक हैसियत बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे। शेष अन्य समुदाय भी ऐसा ही करते थे। सुनार लोग अपने को दैवज्ञ ब्राह्मण बताते थे और धोती को दोहरी करके पहनते थे तथा ‘नमस्कार‘ कहकर अभिवादन करते थे। धोती को पहनने का यह ढंग और नमस्कार करना, ये दोनों ही ब्राह्मणों के खास रिवाज थे। ब्राह्मणों ने उनकी इस नकल को पसंद नहीं किया और न ही सुनारों के इस प्रयास को पसंद किया कि लोग उन्हें भी ब्राह्मण समझें। उन्होंने पेशवा के प्राधिकार से सुनारों के ब्राह्मणों वाले तौर - तरीके अपनाने के प्रयास को बंद