62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
कराने में सफलता प्राप्त कर ली। उन्होंने बंबई स्थित ईस्ट इंडिया कंपनी परिषद् के अध्यक्ष से सुनारों के विरुद्ध निषेधाज्ञा भी जारी करवा दी। पाठारे प्रभु संप्रदाय मेंं किसी समय विधवाओं के पुनर्विवाह की प्रथा थी। लेकिन उस जाति के कुछ लोग विधवाओं के पुनर्विवाह की प्रथा को कुछ समय के बाद सामाजिक पिछड़ेपन का प्रतीक मानने लगे, जिसका खास कारण यह था कि यह ब्राह्मणों में प्रचलित प्रथा के प्रतिकूल थी। इसलिए पाठारे प्रभु समुदाय के कुछ लोगों ने अपने समुदाय का स्तर ऊंचा करने के लिए अपनी जाति में प्रचलित विधवा विवाह प्रथा को रोकने का प्रयत्न किया। पूरा समुदाय दो खेमों में बंट गया। एक पुनर्विवाह के पक्ष में और दूसरा विपक्ष में। पेशवा ने उन लोगों का पक्ष लिया, जो विधवाओं के पुनर्विवाह के पक्ष में थे ओर इस तरह उन्होंने पाठारे प्रभु समुदाय को ब्राह्मणों के तौर - तरीके अपनाने से रोक दिया। हिन्दू लोग मुसलमानों की इसलिए आलोचना करते हैं कि उन्होंने तलवार के बल पर अपना धर्म फैलाया। वे ईसाई धर्म का भी इसलिए उपहास करते हैं कि वे धर्म न्यायाधिकरण के आदेश से काम करते हैं। लेकिन यदि सच पूछा जाए तो हमारे आदर का अधिक पात्र कौन है? वे मुसलमान या ईसाई जो बलपूर्वक अनिच्छुक व्यक्तियों को वह सब करने के लिए विवश कर देते हैं जिसे वे उनकी मुक्ति के लिए आवश्यक समझते हैं, अथवा वे हिन्दू जो ज्ञान का प्रकाश फैलाने नहीं देते, जो दूसरों को अंधेरे में रखने की कोशिश करते रहते हैं, जो अपने बौद्धिक और सामाजिक दाय को उन लोगों के साथ मिल - बांटना नहीं चाहते, जो उस दाय को अंगीकृत करने के लिए पूरी तरह तैयार और इच्छुक हैं? मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अगर मुसलमानों को क्रूर माना जाए तो हिन्दुओं को भी निकृष्ट माना जाना चाहिए और निकृष्टता क्रूरता से भी अधिक निंदनीय है।
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हिन्दू धर्म प्रचारमूलक धर्म था या नहीं, यह विवादास्पद है। कुछ लोगों का विचार है कि यह प्रचारमूलक धर्म कभी नहीं रहा। दूसरों की यह मान्यता है कि यह प्रचारमूलक था तथापि यह स्वीकार करना ही होगा कि किसी समय यह प्रचारमूलक आवश्यक रहा होगा, क्योंकि यह अगर ऐसा न होता तो इसका प्रसार पूरे भारत में सर्वत्र न हो पाता। यह तथ्य भी अवश्य स्वीकार करना होगा कि आज यह प्रचारमूलक नहीं रह पाया है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि हिन्दू धर्म प्रचारमूलक धर्म था या नहीं। असली सवाल यह कि हिन्दू धर्म प्रचारमूलक क्यों नहीं रह पाया? मेरे पास इसका यह जवाब है कि हिन्दू धर्म तब से प्रचारमूलक धर्म नहीं रह गया, जब से हिन्दुओं में जातिप्रथा का उद्गम हुआ। जातिप्रथा धर्म - परिवर्तन नहीं होने देती। धर्म - परिवर्तन में सिर्फ यही समस्या नहीं होती कि नई धारणाएं और नए सिद्धांत अपना लिए जाएं बल्कि दूसरी ओर सबसे बड़ी समस्या इसमें यह पैदा होती है कि धर्म - परिवर्तित व्यक्ति को किस जाति में स्वीकार किया जाए?