जातिप्रथा - उन्मूलन
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जो भी हिन्दू अन्य धर्मियों को अपने धर्म में शामिल करना चाहता है, उसे यह समस्या अनिवार्य रूप से झेलनी पड़ती है। किसी क्लब की सदस्यता तो सबसे लिए समान रूप से खुली रहती है, किन्तु किसी जाति विशेष की सदस्यता हर ऐरे - गैरे के लिए नहीं खुली रहती। जाति का नियम ही यह है कि उसकी सदस्यता उसी जाति में उत्पन्न व्यक्ति को प्राप्त होती है। जातियां स्व - शासित होती हैं। किसी को कहीं भी यह अधिकार नहीं है कि किसी जाति को किसी बात के लिए विवश करे कि वह अपने सामाजिक जीवन में किसी नव - आगंतुक को स्वीकार कर ले। हिन्दू समाज अनेक जातियों का समूह है, और क्योंकि हर - एक जाति एक बंद निगमित संस्था की तरह है, इसलिए धर्म - परिवर्तित व्यक्ति के लिए (किसी भी जाति में) कहीं कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार इस जातिप्रथा ने ही हिन्दुओं को हिन्दू धर्म फैलाने से रोका और अन्य धार्मिक समुदायों को इसमें लीन होने से रोका। अतः जब तक जातिप्रथा रहेगी, हिन्दू धर्म को प्रचारात्मक धर्म नहीं बनाया जा सकता और शुद्धि न केवल मूर्खता होगी, बल्कि निरर्थक भी होगी।
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हिन्दू समुदाय जिन कारणों से शुद्धि करने में असमर्थ है, उन्हीं कारणों से उनका संगठन भी असंभव है। संगठन का मूल आधार यह है कि हिन्दुओं के मन से उस कायरता और बुजदिली को हटा दिया जाए, जिसके कारण वह मुसलमानों और सिखों से अलग हो जाते हैं तथा अपनी रक्षा के लिए वीरता के स्थान पर चालाकी और धोखेबाजी के घटिया तरीके अपनाते हैं। एक स्वाभाविक प्रश्न यह है कि सिख या मुसलमान को वह शक्ति कहां से प्राप्त होती है, जिससे वह बहादुर और निडर बन जाता है। मेरा विश्वास है कि यह इसलिए नहीं है कि उनके शरीर में अपेक्षाकृत अधिक शक्ति होती है, या उनकी खुराक अधिक अच्छी है, या वे अधिक व्यायाम करते हैं। यह शक्ति उनके मन में उत्पन्न इस भावना के कारण है कि अगर किसी सिख पर खतरा होगा तो सारे सिख उसके बचाव के लिए दौड़े आएंगे और यदि मुसलमान पर हमला हुआ, सारे मुसलमान उसकी मदद को आएंगे। हिन्दुओं के पास ऐसी शक्ति नहीं है। उसके मन में यह विश्वास नहीं है कि शेष हिन्दू उसके बचाव के लिए आएंगे। अकेले होने और भाग्य से अकेले रहने के इस अहसास के कारण वह शक्तिहीन रहता है। उसके मन में बुजदिली और कायरता घर कर जाती है और लड़ाई होने पर या तो वह आत्म - समर्पण कर देता है, या भाग जाता है। दूसरी ओर सिख या मुसलमान निडर होकर लड़ता रहता, क्योंकि उसे पता है कि अकेला होने के बावजूद वह अकेला नहीं रहेगा। उसके मन में इस विश्वास का होना उसे लड़ते रहने में सहायक होता है और दूसरे में इस विश्वास का अभाव पराजय स्वीकार करने की स्थिति पैदा कर देता है। यदि इस विषय का और आगे अध्ययन किया जाए और यह पता लगाया जाए कि सिखों और मुसलमानों में इस आत्म - विश्वास का क्या कारण है और हिन्दुओं में मदद और बचाव के विषय में इतनी निराशा क्यों भरी हुई है, तो आपको