जातिप्रथा - उन्मूलन
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शक्ति के रूप में विवाह की परम आवश्यकता होती है। अतः जाति - व्यवस्था को समाप्त करने का वास्तविक उपाय अंतर्जातीय विवाह ही है। जाति व्यवस्था समाप्त करने के लिए जाति - विलय जैसे उपाय को छोड़कर और कोई उपाय कारगर सिद्ध नहीं होगा। आपके जातपांत तोड़क मंडल ने आक्रमण की यही नीति अपना रखी है। यह सीधा और सामने का आक्रमण है। मैं आपके सही निदान और हिन्दुओं से यह कहने का साहस दिखाने के लिए आपको बधाई देता हूं कि वास्तव में उनमें (हिन्दुओं) क्या दोष है। सामाजिक अत्याचार के मुकाबले राजनीतिक अत्याचार कुछ भी नहीं है और वह सुधारक जो समाज का विरोध करता है, उस राजनीतिज्ञ से अधिक साहसी होता है, जो सरकार का विरोध करता है। आपका यह कहना सही है कि जाति - व्यवस्था उसी स्थिति में समाप्त होगी। जब रोटी - बेटी का संबंध सामान्य व्यवहार में आ जाए। आपने बीमारी की जड़ का पता लगा लिया है। लेकिन क्या बीमारी के लिए आपका नुस्खा ठीक है, यह प्रश्न अपने आपसे पूछिए। अधिसंख्य हिन्दू रोटी - बेटी का संबंध क्यों नहीं करते? आपका उद्देश्य लोकप्रिय क्यों नहीं है? उसका केवल एक ही उत्तर है और वह है कि रोटी - बेटी का संबंध उन आस्थाओं और धर्म - सिद्धांतों के प्रतिकूल है, जिन्हें हिन्दू पवित्र मानते हैं। जाति ईंटों की दीवार या कांटेदार तारों की लाइन जैसी कोई भौतिक वस्तु नहीं है, जो हिन्दुओं को मेल - मिलाप से रोकती हो और जिसे तोड़ना आवश्यक हो। जाति तो एक धारणा है और यह एक मानसिक स्थिति है। अतः जाति - व्यवस्था को नष्ट करने का अर्थ भौतिक रूकावटों को दूर करना नहीं है। इसका अर्थ विचारात्मक परिवर्तन से है। जाति - व्यवस्था बुरी हो सकती है। जाति के आधार पर ऐसा घटिया आचरण किया जा सकता है, जिसे मानव के प्रति अमानुषिकता कहा जा सकता है। फिर भी, यह स्वीकार करना हेग कि हिन्दू समुदाय द्वारा जातिप्रथा मानने का कारण यह नहीं है कि उनका व्यवहार अमानुषिक और अन्यायपूर्ण है। वह जातपांत को इसलिए मानते हैं, क्योंकि वह अत्यधिक धार्मिक होते हैं। अतः जातपांत मानने में लोग दोषी नहीं हैं। मेरी राय में उनका धर्म दोषी है, जिसके कारण जाति - व्यवस्था की धारणा का जन्म हुआ है। यदि यह बात सही है तो यह स्पष्ट है कि वह शत्रु जिसके साथ आपको संघर्ष करना है, वे लोग नहीं है जो जातपांत मानते हैं, बल्कि वे शास्त्र हैं, जिन्होंने जाति - धर्म की शिक्षा दी है। रोटी - बेटी का संबंध न करने या समय - समय पर अंतर्जातीय खान - पान और अंतर्जातीय विवाहों का आयोजन न करने के लिए लोगों की आलोचना या उनका उपहास करना वांछित उद्देश्य को प्राप्त करने का एक निरर्थक तरीका है। वास्तविक उपचार यह है कि शास्त्रों से लोगों के विश्वास को समाप्त किया जाए। यदि शास्त्रों ने लोगों के धर्म, विश्वास और विचारों को ढालना जारी रखा तो आप कैसे सफल होंगे? शास्त्रों की सत्ता का विरोध किए बिना, लोगों को उनकी पवित्रता और दंड विधान में विश्वास करने के लिए अनुमति देना और फिर उनके अविवेकी और अमानवीय कार्यों के लिए उन्हें दोष लगाना और उनकी आलोचना करना सामाजिक सुधार करने का अनुपयुक्त तरीका है। ऐसा प्रतीत होता है कि महात्मा गांधी समेत अस्पृश्यता