2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 97

80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

को समाप्त करने वाले समाज सुधारक यह महसूस नहीं करते हैं कि लोगों के कार्य मात्र उन धर्म - विश्वासों के परिणाम हैं, जो शास्त्रों द्वारा उनके मन में पैदा कर दिए गए हैं। लोग तब तक अपने आचरण में परिवर्तन नहीं करेंगे, जब तक वे शास्त्रों की पवित्रता में विश्वास करना नहीं छोड़ देते, जिस पर उनका आचरण आधारित है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ऐसे प्रयासों का कोई सकारात्मक परिणाम न निकले। आप भी वही गलती कर रहे हैं, जो अस्पृश्यता को समाप्त करने के उद्देश्य से काम करने वाले समाज सुधारक कर रहे हैं। रोटी - बेटी के संबंध के लिए आंदोलन करना और उनका आयोजन करना कृत्रिम साधनों से किए जाने वाले, बलात् भोजन कराने के समान है। प्रत्येक पुरुष और स्त्री को शास्त्रों के बंधन से मुक्त कराइए, शास्त्रों द्वारा प्रतिष्ठापित हानिकर धारणाओं से उनके मस्तिष्क का पिंड छुड़ाइए, फिर देखिए, वह आपके कहे बिना अपने आप अंतर्जातीय

खान - पान तथा अंतर्जातीय विवाह का आयोजन करेगा/करेगी।

वाद विवाद में फंसने से कोई लाभ नहीं है। लोगों से यह कहने में कोई लाभ नहीं है कि शास्त्रों में वैसा नहीं कहा गया है, जैसा कि वे विश्वास करते हैं, व्याकरण की दृष्टि से पढ़ते हैं या तार्किक ढंग से उनकी व्याख्या करते हैं। यह कोई बात नहीं है कि लोग शास्त्रों का ज्ञान किस प्रकार से ग्रहण करते हैं। आपको ऐसा दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जैसा कि बुद्ध ने किया था। आपको वह मोर्चा लेना होगा जो गुरु नानक ने लिया था। आपको शास्त्रों की केवल उपेक्षा ही नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनकी सत्ता स्वीकार करने से इन्कार करना होगा, जैसा कि बुद्ध और नानक ने किया था। आपको हिन्दुओं से यह कहने का साहस रखना चाहिए कि दोष उनके धर्म का है - वह धर्म जिसने आपमें यह धारणा पैदा की है कि जाति - व्यवस्था पवित्र है। क्या आप ऐसा साहस दिखाएंगे।

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आपको सफलता मिलने के अवसर क्या हैं? सुधार की विभिन्न किस्में हैं। एक किस्म वह है जो लोगों की धार्मिक धारणा से संबंधित नहीं है, लेकिन उसका स्वरूप विशुद्ध रूप से धर्म निरपेक्षता वाला है। सुधार की दूसरी किस्म का संबंध लोगों की धार्मिक भावना से है। सामाजिक सुधारों की इन किस्मों के दो प्रकार हैं। एक में, सुधार धर्म के सिद्ध ांतों के अनुरूप होता है और उन लोगों से जो इन सिद्धांतों से विचलित हो गए हैं, यह कहा जाता है कि वे उनको फिर से स्वीकार कर लें और उनका पालन करें। दूसरे प्रकार के सुधार में, न केवल धार्मिक सिद्धांतों में हस्तक्षेप किया जाता है, बल्कि उनका पूर्ण रूप से विरोध किया जाता है और लोगों से यह कहा जाता है कि वे इन सिद्धांतों का पालन न करें और उनकी सत्ता की अवज्ञा करें। जाति - व्यवस्था ऐसे कुछ धार्मिक विश्वासों का स्वाभाविक परिणाम हैं, जो शास्त्र - सम्मत हैं। शास्त्रों के बारे में यह विश्वास किया जाता है कि ईश्वर द्वारा प्रेरित उन ऋषियों का आदेश निहित है, जो अलौकिक प्रज्ञा से सम्पन्न थे। अतः ऋषियों की आज्ञाओं का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। यदि उल्लंघन किया