4. स्पृश्य बनाम अस्पृश्य - Page 100

स्पृश्य बनाम अस्पृश्य

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क्योंकि कात्यायन के अनुसार केवल वे ही जो वेदाध्ययन करने के अधिकारी थे, यज्ञ करने के भी अधिकारी थे। यह तथ्य कि कभी शूद्र वेदाध्ययन के अधिकारी थे, एक ऐसा तथ्य है, जिसका सम्यक समर्थन ‘महाभारत’ के ‘शांति पर्व’ में उल्लिखित परंपरा करती है। वहां भृंगु ट्टषि ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है कि वर्ण का निर्धारण कैसे किया जाए? उत्तर इस प्रकार हैः

पहले वर्णों में कोई अंतर नहीं था। ब्रह्मा से उत्पन्न होने के कारण यह सारा

जगत ब्राह्मण ही था। बाद में विभिन्न कर्मों के कारण उनमें वर्ग-भेद हो गया। जो

ब्राह्मण (द्विज) अपने ब्राह्मणोचित धर्म को परित्याग करके विषय-भोग के प्रेमी,

तीक्ष्ण स्वभाव वाले हो गए और इन्हीं कारणों से जिनका शरीर लाल हो गया, वे

क्षत्रिय भाव को प्राप्त हुए। जिन्होंने गौओं से तथा कृषिकर्म द्वारा जीविका चलाने

की वृत्ति अपना ली और उसी के कारण जिनका रंग पीला पड़ गया तथा जो

ब्राह्मणोचित धर्म को छोड़ बैठे, वे ब्राह्मण ही वैश्य भाव को प्राप्त हुए। जो शौच

तथा सदाचार से भ्रष्ट होकर हिंसा और असत्य के प्रेमी हो गए, लोभवश व्याधों

के समान सभी तरह के निन्ध्र-कर्म करके जीविका चलाने लगे और उसी के

कारण जिनका रंग काला पड़ गया, वे ब्राह्मण शूद्र भाव को प्राप्त हो गए। इन्हीं

कर्मों के कारण ब्राह्मण शूद्र भाव को प्राप्त हो गए। इन्हीं कर्मों के कारण ब्राह्मणत्व

से अलग होकर वे सभी ब्राह्मण दूसरे-दूसरे वर्ण के हो गए, किंतु उनके लिए

नित्य धर्मानुष्ठान और यज्ञ-कर्म का कभी निषध नहीं किया गया है। इस प्रकार

ये चार वर्ण हुए, जिनके लिए ब्रह्मा ने पहले ब्राह्मी सरस्वती (वेदवाणी) प्रकट

की। लेकिन लोभ-विशेष के कारण शूद्र अज्ञान भाव को प्राप्त हुए।

‘ब्राह्मी सरस्वती’ शब्द की व्याख्या करते हुए व्याख्याकार ने कहा हैः

वेद-रहित सरस्वती की रचना पहले ब्रह्मा ने सभी चारों वर्णों के लिए की,

लेकिन लोभ-विशेष के कारण शूद्र अज्ञान (तमस भाव) को प्राप्त हुए और

वेदाध्ययन के अनधिकारी हो गए।

शूद्रों का दर्जा घटाने के बाद वैश्यों की बारी आई। सर्वाधिक कटु वर्ग-युद्ध ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच हुआ। हिंदू शास्त्रों में इन दो वर्णों के बीच वर्ग-युद्ध का प्रचुर उल्लेख है। सर्वप्रथम संघर्ष ब्राह्मणों और राजा वेन के बीच हुआ।

पहले कभी अंग नामक प्रजापति हुआ करता था। वह सत्य का संरक्षक था।

वह अत्रि जाति का था और शक्ति में अत्रि जैसा ही था। प्रजापति वेन उसका

पुत्र था। वेन को जैसे-तैसे कर्तव्य की शिक्षा दी गई। मृत्यु की पुत्री सुनीता के

गर्भ से उसका जन्म हुआ। काल की पुत्री के इस पुत्र ने अपने नाना से कुसंस्कार