86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ग्रहण किया। अतः वह अपने कर्तव्य से विमुख हो गया और काम के वशीभूत होकर लोभी बन गया। इस राजा ने अधार्मिक आधार-प्रणाली की स्थापना की। वेदाज्ञाओं का उल्लंघन कर धर्म-विरुद्ध आचार-व्यवस्था की स्थापना की और वह क्रूर कर्म करने लग गया। उसके शासन-काल में लोग पवित्र ग्रंथों के अध्ययन और वषट्कार (यज्ञ-कर्म) से विमुख हो गए। देवता यज्ञों में सोम रस के नैवेद्य से वंचित हो गए। उसने घोषणा कर दी, ‘यज्ञ मेरे लिए है, मैं ही यज्ञकर्ता हूं, मैं ही यज्ञ हूं। अतः हवि मुझे ही दी जाए और नैवेद्य भी मुझे ही अर्पित किया जाए।’ कर्तव्य संबंधी नियमों का उल्लंघन करने वाले तथा दाय भाग पर झूठा अधिकार जताने वाले उस राजा से तब मारीचि के नेतृत्व में सभी महर्षियों ने कहा, ‘हे राजन हम एक यज्ञ करना चाहते हैं। यह अनुष्ठान अनेक वर्षों तक चलेगा। अतः असत्य का आचरण न करो। यह तुम्हारा सनातन कर्तव्य नहीं है। तुम अत्रि के वंशज हो और तुम्हारा कर्तव्य अपनी प्रजा का पालन करना है।’ मूर्ख वेन को सद्-असद् का कोई ज्ञान नहीं था। उसने ऋषियों का उपहास करते हुए उनको उत्तर दिया, ‘मेरे सिवाए और कौन है, जो कर्तव्य का विधान करता है? मुझे किसकी आज्ञा का पालन करना चाहिए? है कोई इस भूतल पर जो पवित्र ज्ञान, धर्मपरायणता, सत्य में मेरी बराबरी कर सके? अरे, तुम तो भ्रमित तथा मतिहीन हो, तुम क्या जानों कि मैं ही सभी प्राणियों तथा कर्तव्यों का आदि स्रोत हूं। तुम समझ लो कि यदि मैं चाहूं तो पृथ्वी को भस्म कर दूं अथवा उसे जलमग्न कर दूं अथवा स्वर्ग और धरती को एक कर दूं।’ जब मतिभ्रष्ट तथा अहंकारी वेन को सुमार्ग पर नहीं लाया जा सका तो ट्टषिगण क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने उस उत्पाती तथा कलह-प्रिय राजा को दबोच लिया और उसकी बाईं जंघा का मर्दन किया। जंघा के इस मर्दन से काले वर्ण का एक व्यक्ति उत्पन्न हुआ। वह नाटे कद का था। भय के मारे वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। अत्रि ने उसे भयातुर देखकर उससे कहा, ‘निषिद’ बैठ जाओ। वह व्यक्ति निषादों की जाति का संस्थापक बना। वह धीवरों (मछुआरों) का जनक भी बना, जो वेन के पाप से पैदा हुए। विंध्य श्रेणी के तुखार और तुम्बुरा नामक अन्य निवासी भी उसी से पैदा हुए, जो क्रूर कर्म करते थे। फिर उन क्रुद ट्टषियों ने वेन के दाएं हाथ का मर्दन उसी प्रकार किया, जैसे अरणि किया जाता है। उससे पृथु पैदा हुआ। उसका शरीर साक्षात अग्नि जैसा जल रहा था।
वेन के पुत्र पृथु ने तब हाथ जोड़कर महान ट्टषियों से कहाः ‘कर्तव्य के सिद्धांतों को समझने के लिए प्रकृति ने मुझे अति अल्प बुद्धि प्रदान की है। कृपया बताएं, किस प्रकार मैं उसका उपयोग करूं। आप मुझे जो बताएंगे, निस्संदेह मैं वही करूंगा।’ फिर उन देवताओं तथा महर्षियों ने उससे कहा, ‘जो कर्तव्य बताया