4. स्पृश्य बनाम अस्पृश्य - Page 102

स्पृश्य बनाम अस्पृश्य

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जाए, उसका बिना किसी संकोच के पालन करो, भले ही वह तुम्हें रुचिकर न हो, सभी प्राणिकयों के प्रति समदृष्टि रखों, काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार से दूर रहो। अपने भुजबल से उन सभी लोगों पर अंकुश रखो, जो सच्चाई के रास्ते से विमुख हो जाते हैं और कर्तव्य के प्रति सजग रहते हुए मन, वचन और कर्म से पृथ्वी के देवताओं (वेद अथवा ब्राह्मण) की रक्षा का व्रत लो और उस व्रत का सतत् पालन करते रहो।... और वचन दो कि तुम ब्राह्मणों को दंड से मुक्त रखोगे, और समाज को वर्ण संकरता से बचाओगे।’ इस पर ट्टषियों के नेतृत्व वाले देवताओं को जिनका नेतृत्व ट्टषि कर रहे थे, वेन के पुत्र ने उत्तद दियाः ‘निश्चय ही मैं महान ब्राह्मणों का, जो मनुष्यों में उत्तम हैं, आदर करूंगा।’ उन ट्टषियों ने कहा, ‘तथास्तु’। दिव्य के ज्ञान के भंडार शुक्र उसके पुरोहित बने, बालखिल्य ट्टषिगण तथा सारस्वेत्य ट्टषिगण उसके मंत्री बने और पूजनीय गर्ग नामक महर्षि उसके ज्योतिषि बने।

दूसरा संघर्ष ब्राह्मणों तथा क्षत्रिय राजा पुरुरवा के बीच हुआ। ‘महाभारत’ के ‘आदि पर्व’ में उसका संक्षिप्त उल्लेख मिलता है।

... उसके बाद इला के गर्म से विद्वान पुरुरवा का जन्म हुआ। सुना जाता है कि इला पुरुरवा की माता भी थी और पिता भी। राजा पुरुरवा समुद्र के तेरह द्वीपों का शासन और उपभोग करते थे। महायशस्वी पुरुरवा मनुष्य होकर भी देवताओं से घिरे रहते थे। उन्होंने अपने पराक्रम से उन्मत्त हो ब्राह्मणों के साथ युद्ध किया, और ब्राह्मणों से उनके रत्नों को छीन लिया, जिसका उन्होंने तीव्र प्रतिकार भी किया था। ब्रह्म लोक से सतत्कुमार ने ब्रह्म लोक आकर उनकी भर्त्सना की, जिसका उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तब क्रुद्ध महर्षियों के शाप से वह भस्म हो गए। वह बल के घमंड में अपनी विवेक-शक्ति खो बैठे थे। इस तेजस्वी राजा ने गंधर्व लोक से लाकर पृथ्वी पर यज्ञ के लिए अग्नियों की स्थापना की।

कहा जाता है कि तीसरा संघर्ष ब्राह्मणों और राजा नहुष के बीच हुआ। ‘महाभारत’ के ‘उद्योग पर्व’ में उस कथा का विस्तार से वर्णन किया गया है। उसमें कहा गया हैः

वृत्रासुर की हत्या करने के बाद इंद्र इस बात से भयभीत होकर कि उन्होंने ब्रह्म-हत्या की है (क्योंकि वृत्र को ब्राह्मण माना जाता था), जल में छिप गए। जब देवराज इंद्र अदृश्य हो गए तो भूतल तथा स्वर्ग का सभी कारोबार अस्त-व्यस्त हो गया। ट्टषियों तथा देवताओं ते तब नहुष से राजा बन जाने की प्रार्थना की। पहले तो नहुष ने बहाना बनाया कि उनमें बल का अभाव है, पर अंततः उन्होंने ट्टषियों का आग्रह स्वीकार कर लिया। जब तक वह उच्च पद पर आसीन नहीं