स्पृश्य बनाम अस्पृश्य
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पत्नी को एक युक्ति सुझाई, जिसके द्वारा अनाधिकार चेष्टा करने वाले नहुष को उसके पद से हटाया जा सकता है। उसे यह अधिकार बताया गया कि वह नहुष से यह कहे कि ‘अगर तुम ट्टषियों द्वारा ढोए गए दिव्य वाहन (पालिका) में बैठकर मेरे पास आओ, तब मैं सहर्ष तुम्हें स्वीकार कर लूंगी।’ नहुष ने इंद्राणी के आने पर उसका सत्कार किया और इंद्राणी ने देवताओं की समस्या नहुष को सुनाई और यह प्रस्ताव रखा, ‘हे देवराज, मेरी इच्छा है कि आपके पास एक ऐसा अपूर्व वाहन (पालकी) हो, जैसा कि विष्णु, रुद्र, असुर और राक्षरों के पास भी न हो। प्रभो, महर्षि मिलकर इस वाहन में आपको लाएं। राजन् इससे मुझे प्रसन्नता होगी।’ इंद्राणी ने ऐसा कहने पर देवराज नहुष को बात जंच गई और देवराज नहुष आत्म-प्रशंसा से भरकर बोले, ‘जो ट्टषियों को अपना वाहन बना सकता है, वही शक्तिशाली होता है। मैं परम शक्ति का अनन्य उपासक हूं। भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों का अधिपति हूं। मेरे कुपित होने पर यह संसार मिट जाएगा। मुझ पर ही सब कुछ टिका है।... अतः देवि, निश्चय ही मैं तुम्हारी इच्छा का पालन करूंगा। सारे सप्तर्षि और ब्रह्मर्षि मेरी पालकी ढोएंगे। हे सुंदरी, मेरे शौर्य और समृद्धि को तुम स्वयं देखना।’ तद्नुसार उस दुराचारी, उग्र, मदांध, स्वेच्छाचारी नहुष ने ट्टषियों को, जो उसके आदेश की अवज्ञा नहीं कर सके, अपनी पालकी में जोत दिया और उन्हें पालकी ले चलने के लिए कहा। इंद्राणी पुनः वृहस्पति के पास गई। वृहस्पति ने उसे पुनः आश्वासन दिया कि नहुष अपने गर्व के कारण शीघ्र ही भ्रष्ट हो जाएगा और वह उस अत्याचारी के नाश तथा इंद्र के छिपने के स्थान का पता लगाने के लिए यज्ञ करेंगे। इसके बाद इंद्र का पता लगाने और उन्हें वृहस्पति के पास लाने के लिए अग्नि को भेजा जाता है। इंद्र के आने पर वृहस्पति उन्हें उनकी अनुपस्थिति में हुए कांड के बारे में बताते हैं। इंद्र जब कुबेर, यम, सोम और वरुण के साथ बैठकर नहुष के वध का उपाय सोच रहे थे, उसी समय वहां तपस्वी अगस्तय दिखाई देते हैं। उन्होंने इंद्र को उनके प्रतिद्वंदी के पतन पर बधाई दी और सारा वृतांत बताया। उन्होंने कहा किः महाभाग देवर्षि तथा निर्मल अंतःकरण वाले ब्राह्मर्षि पापाचारी नहुष को ढोते-ढोते जब थक गए, तब उन्होंने नहुष से एक शंका प्रकट की, ‘विजयी, वीरों में श्रेष्ठ, हे वसव, बलि देने से पूर्व उसे अभिषिक्त करने के लिए जिन मंत्रों के उच्चारण का विधान वेद में निहित है, क्या आप उन्हें प्रामाणिक मानते हैं?’ नहुष की बुद्धि अज्ञान के अंधकार से ग्रसित थी। उसने कहा, ‘मैं इन वेद-मंत्रों को प्रामाणिक नहीं मानता।’ ट्टषियों ने कहा, ‘आप अधर्म में प्रवृत्त हो रहे हैं। इसलिए धर्म का तत्व नहीं समझ रहे हैं। ये मंत्र पूर्व-काल में महर्षियों ने हमें सुनाए थे और हम इन्हें प्रामाणिक मानते हैं।’ अगस्त्य ने आगे कहा - तब नहुष