90 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मुनियों से विवाद करने लगा और क्रोध में भरकार उस पापी ने मेरे मस्तक पर अपने पैर से प्रहार किया। इससे उसका सारा तेज नष्ट हो गया और वह श्रीहीन हो गया। वह क्षुब्ध और भयभीत हो उठा। मैंने उससे कहा, ‘मूर्ख तू उन पवित्र मंत्रों की निंदा करता है, जो सर्वदा से पूजनीय रहे हैं। जिनकी रचना प्राचीन ट्टषियों ने की है, जिनको ब्रह्मर्षि उपयोग में लाते थे, तूने मेरे सिर पर अपने पैर से प्रहार किया है, तू ब्रह्मा के समान और अजेय ट्टषियों से अपनी पालकी उठवाता है, इसीलिए तू श्रीहीन हो गया है, तेरे सारे पुण्य नष्ट हो गए हैं, तेरा पतन हो, तू स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरकर विशाल सर्प बनकर दस हजार वर्षों तक रेंगेगा। इस अवधि के पूरा होने पर पुनः स्वर्ग लोक को प्राप्त होगा।’ इस प्रकार दुरात्मा नहुष स्वर्ग से निष्कासित हुआ।।
उसके बाद राजा निमि और ब्राह्मणों के बीच संघर्ष का उल्लेख मिलता है। ‘विष्णु पुराण’ में यह वृतांत इस प्रकार वर्णित हैः
निमि ने ब्रह्मषि वशिष्ठ से प्रार्थना की कि वह यज्ञ में पुरोहित बनें। यज्ञ एक हजार वर्ष चलने वाला था। उत्तर में वशिष्ठ ने कहा कि वह पहले ही पांच सौ वर्ष के लिए इंद्र को वचन दे चुके हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि इस अवधि के समाप्त होने पर वह लौट आएंगे। राजा ने कुछ नहीं कहा। वशिष्ठ यह धारणा लेकर वहां से चले गए कि राजा इस व्यवस्था से सहमत हो गए हैं। लेकिन वापस लौटने पर उनको पता चला कि निमि ने (वशिष्ठ के स्तर के) ब्रह्मर्षि गौतम तथा अन्य ट्टषियों को यज्ञ करने के लिए आमंत्रित कर रखा है। चूंकि उन्हें उसकी कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई, इसलिए उन्होंने इस अपनी अवहेलना समझा और तब कुपित होककर उन्होंने राजा को, जो उस समय सोया हुआ था, श्राप दिया कि उसका स्थूल शरीर नष्ट हो जाए। जब राजा सोकर उठे और पता चला कि उन्हें बिना किसी पूर्व चेतावनी के श्राप दे दिया गया तो उन्होंने भी प्रतिरोध में वशिष्ठ को वैसा ही श्राप दे डाला और अपनी शरीर छोड़ दिया। इस श्राप के फलस्वरूप (‘विष्णु पुराण’ 4, 5, 6 में आगे कहा गया है) वशिष्ठ का तेज मित्र और वरुण के तेज में प्रविष्ठ कर गया और उसने उनके वीर्य से दूसरा शरीर प्राप्त कर लिया, जो उर्वशी को देखकर स्खलित हुआ था। निमि के शव को संलेपन द्वारा सुरक्षित रखा गया। जो यज्ञ निमि ने प्रारंभ किया था, उसके समापन पर पुरोहितों के अनुनय-विनय करने पर देवता निमि को पुनर्जीवित करने के लिए राजी हो गए। लेकिन निमि ने यह प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया और उनकी इच्छा के अनुसार देवताओं ने उन्हें सभी चेतन प्राणियों की आंखों में स्थान दे दिया। इसी तथ्य का यह प्रभाव है कि प्राणी सदा आंखे खोलते और बंद करते रहते हैं (निमिष का अर्थ है, ‘पलक की झपक’)।