स्पृश्य बनाम अस्पृश्य
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मनु ब्राह्मणों तथा राजा सुमुख के बीच हुए एक और संघर्ष का उल्लेख करता है। पर उसके बारे में कोई ब्यौरा प्राप्त नहीं है।
ये ब्राह्मणों तथ क्षत्रिय राजाओं के बीच हुए संघर्षों के उदाहरण हैं। इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि दो वर्गों के रूप में ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच झड़पें नहीं हुईं। इसी तथ्य के प्रचुर प्रमाण मिलते हैं कि राजाओं से हुई झड़पों के अलावा इन दो वर्गों के बीच भी झड़पें हुईं। ये प्रमाण ऐतिहासिक महत्व की सामग्री हैं, जिस पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। इस प्रकार की तीन घटनाएं उल्लेखनीय हैं।
पहला विवाद तो क्षत्रिय विश्वामित्र और ब्राह्मण वशिष्ठ के बीच ठना। दोनों के बीच विवाद का मुद्दा था कि क्या कोई क्षत्रिय ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर सकता है। इसका वर्णन ‘रामायण’ में इस प्रकार मिलता हैः
कहा जाता कि कि प्राचीन-काल में कुश नामक एक प्रसिद्ध राजा हुए हैं।
वह प्रजापति के पुत्र थे। कुश के पुत्र का नाम कुशानभ था। कुशानभ के पुत्र
गाधि नाम से विख्यात थे। उन्हीं गाधि के पुत्र विश्वामित्र हुए। विश्वामित्र ने कई
हजार वर्षों तक पृथ्वी पर शासन किया। एक समय की बात है कि जब वह
पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे थे तो वह महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पर आ पहुंचे,
जहां अनेक संत, महात्मा, ट्टर्षि और भक्तगण निवास किया करते थे। वहां पहले
तो उन्होंने आतिथ्य स्वीकार नहीं किया, पर बाद में अपनी सेना-सहित ब्रह्मा के
पुत्र (वशिष्ठ) का आतिथ्य स्वीकार कर लिया। वहां विश्वामित्र एक अद्भुत गौ
को देखकर ललचा उठे, जिसने अत्यंत स्वादिष्ठ भोजन प्रदान किया था। सर्वप्रथम
उन्होंने उस गौ को उन्हें एक सहस्त्र गौओं के बदले देने के लिए कहा। उन्होंने
यह भी कहा µ ‘यह गौ तो रत्न है और चूंकि रत्न राजा की संपत्ति होते हैं,
अतः इस गौ पर मेरा अधिकार है।’ जब वशिष्ठ ने इस मूल्य को स्वीकार नहीं
किया तो विश्वामित्र ने और अधिक मूल्य देने का प्रस्ताव किया, पर उसको
कोई फल नहीं हुआ। तब उसने कृतघ्नतापूर्वक और बलपूर्वक उस गौ को अपने
अधीन कर लिया। वह गौ राजा के सेवकों को झटक का अपने स्वामी के पास
चली गई और कहने लगी कि उन्होंने उसका त्याग क्यों किया है। ब्रह्मर्षि ने उत्तर
दिया कि वह उसका त्याग नहीं कर रहे हैं, पर राजा उनसे कहीं अधिक बलवान
है। गौ उत्तर देती है, ‘लोग क्षत्रिय के बल को नहीं स्वीकार करते। ब्राह्मण ही
अधिक बलवान होते हैं। ब्राह्मण का बल दिव्य होता है। वह क्षत्रिय-बल से श्रेष्ठ
होता है। आपका बल असीम है। भले ही विश्वामित्र महापराक्रमी है, पर आपसे
अधिक बलवान नहीं है। आपका तेज दुर्घर्ष है। आपने मुझे ब्रह्म-बल से प्राप्त
किया है। आप तो केवल मुझे आज्ञा दीजिए। मैं इस दुरात्मा राजा के गर्व, बल