92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और उद्यम को अभी नष्ट किए देती हूं।’ गौ ने तब रंभाकर सैकड़ों पहलवानों की सृष्टि कर दी। उन्होंने विश्वामित्र की सारी सेना का संहार कर दिया। इसके बदलने में विश्वामित्र ने उनका संहार कर दिया। तब गौ ने पुनः यवनों और शकों की सृष्टि कर दी, जो महापराक्रमी और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थे। उन्होंने विश्वामित्र की सारी सेना को भस्म कर डाला। पर विश्वामित्र ने उन वीरों को भी पराजित कर दिया। तब गौ ने रंभाकर अपने शरीर के उन विभिन्न भागों से विभिन्न प्रजातियों के अनेक योद्धाओं की सृष्टि की। उन्होंने पैदल सैनिकों, हाथियों, घोड़ों और रथ-सहित विश्वामित्र की समूची सेना का तत्काल संहार कर डाला। अपनी सेना की यह दशा देखकर विश्वामित्र के सौ पुत्र अत्यंत क्रोध से भर उठे और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लेकर वशिष्ठ मुनि पर टूट पड़े, पर वे महर्षि के मुख से निकली ज्वाला में जलकर भस्म हो गए। इस प्रकार जब विश्वामित्र पूर्णतया परास्त एवं पराजित हो गए तो उन्होंने अपने एक पुत्र को अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया और हिमालय चले गए। वहां उन्होंने घोर तपस्या की और उसके द्वारा महादेव के दर्शन प्राप्त किए, जिन्होंने उनकी इच्छानुसार उन्हें युद्ध-विज्ञान के सभी अंग-उपांगों की शिक्षा दी और उन्हें दिव्य अस्त्र प्रदान किए, जिन्हें प्राप्त कर वह अभिमान से भर गए। उन्होंने वशिष्ठ के आश्रम को भस्म कर डाला और वहां के निवासी भाग खड़े हुए। वशिष्ठ ने विश्वामित्र को चुनौती दी ओर उन्होंने अपना ब्रह्मदंड उठा लिया। विश्वामित्र ने भी अपना आग्नेयास्त्र उठा लिया और चुनौती दी और कहा µ ‘खड़ा रह।’ वशिष्ठ ने भी उसे ललकारा और कहा, ‘मैं तेरा घमंड अभी धूल में मिला दूंगा। क्षत्रिय-बल और ब्राह्मण के तेज में तुलना कैसी? देख, नीच क्षत्रिय, तू मेरे दिव्य ब्रह्म तेज को देख।’ गाधि पुत्र विश्वामित्र ने जिस भयंकर आग्नेयास्त्र का संधान किया था, वह वैसे ही शांत हो गया, जैसे जल से अग्नि शांत हो जाती है। तब विश्वामित्र ने अपने प्रतिद्वंदी पर ब्रह्मपाश, कालपाश, वरुणपाश, विष्णुचक्र, शिव का त्रिशूलास्त्र आदि विविध प्रकार के दिव्यास्त्र चलाए, जिन्हें ब्रह्माण के पुत्र ने अपने सर्वभक्षी ब्रह्मदंड में समाहित कर लिया। अंत में विश्वामित्र ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, जिससे सभी देवी-देवता कांप उठे। पर ब्रह्मर्षि प्र वह भी निष्प्रभावी रहा। वशिष्ठ ने अब रौद्र रूप धारण कर लिया था, उनके रोमकूपों में से धूम्रयुक्त आग की लपटें निकलने लगीं और उनके हाथ में ब्रह्मदंड धूम्ररहित कालाग्नि के समान प्रज्ज्वलित हो उठा, मानों वह द्वितीय यमदंड हो। मुनियों द्वारा शांत किए जाने पर, जिन्होंने यह घोषित किया कि वह अपने प्रतिद्वंदी से श्रेष्ठ हैं, ब्रह्मर्षि ने अपना क्रोध शांत किया, विश्वामित्र हताश होकर बोले, ‘क्षत्रिय के बल को धिक्कार है। ब्रह्म तेज से प्राप्त होने वाला बल ही वास्तव में बल