98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के देवता) भी उसके साथ रहेंगे। मुनि ने इस षडयंत्र को ताड़ लिया और अति कुपित होकर अप्सरा को शाप दे दिया कि वह एक हजार वर्षों तक पत्थर बन कर रहे। शाप प्रभावी हो गया और कंदर्प तथा इंद्र वहां से लज्जित हो खिसक लिए। इस प्रकार भले ही मुनि ने काम के प्रलोभन का तो प्रतिरोध कर लिया, पर क्रोध से तपस्या का पूर्णतः क्षय हो गया। उन्हें तप पुनः प्रारंभ करना पड़ा। उन्होंने निश्चय किया कि जब तक उन्हें मनचाहा ब्राह्मत्व प्राप्त नहीं होगा, तब तक वह ने तो क्रोध करेंगे और न किसी भी अवस्था में मुंह से कुछ बोलेंगे, सौ वर्षों तक श्वास भी नहीं लेंगे और अपने शरीर को सुखा डालेंगे। वह तब हिमालय पर्वत को छोड़ पूर्व की ओर चले गए। वहां प्रतिज्ञा के अनुसार उन्होंने एक हजार वर्षों तक मौन रहकर भंयकर तप किया, जैसा कि किसी ने नहीं किया था। अब तक उन्हें पूर्णत्व प्राप्त हो चुका था और अनेक बाधाओं के बावजूद वह कभी क्रुद्ध नहीं हुए थे। व्रत समाप्त होने पर उन्होंने अपने लिए भोजन तैयार किया, जिसे इंद्र ने ब्राह्मण वेश में आकर मांगा। तद्नुसार विश्वामित्र ने वह अन्न उन्हें दे दिया। उस अन्न में से कुछ भी नहीं बचा और उन्हें भूखा रहना पड़ा। फिर भी उन्होंने ब्राह्मण से कुछ नहीं कहा। उन्होंने अपने व्रत का यथार्थ रूप से पालन किया। इसके बाद पुनः वह श्वास-रहित मौन व्रत में लीन हो गए। सांस न लेने के कारण उनके मस्तक से धुंआ उठने लगा। इससे तीनों लोकों के प्राणी थर्रा उठे। इससे त्रस्त होकर देवताओं और ट्टषियों आदि ने ब्रह्मा से कहा, ‘देव ! अनेक प्रकार से महामुनि विश्वामित्र को लोभ और क्रोध दिलाने की चेष्ठ की गई, किंतु वह और भी निर्मल होते जा रहे हैं। यदि उनकी इच्छा पूरी नहीं की गई तो वे अपनी तपस्या से तीनों लोकों को नष्ट कर डालेंगे। सभी दिशाओं में अंधकार छा रहा है, कहीं भी प्रकाश नहीं है, समुद्र शुब्ध हो उठा है, सारे पर्वत चकनाचूर हुए जाते हैं, धरती कांप रही है और प्रचंड आंधी चलने लगी है। हे ब्रह्मा ! हम इस बात की गारंटी नहीं दे सकते कि मानव-जाति नास्तिक नहीं होगी। अतः इससे पहले कि यह महान और तेजस्वी मुनि अग्नि के रूप में (सब-कुछ) भस्म कर देंगे, उन्हें प्रसन्न किया जाए।’ तब ब्रह्मा सभी देवताओं को अपने साथ लेकन विश्वामित्र के पास जाकर बोले µ ‘ब्राह्मण ट्टषि, तुम्हारी जय हो। हम तुम्हारी तपस्या से अति प्रसन्न हुए। हे कौशिक, तुमने अपनी गहन तपस्या से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया है। हे ब्राह्मण, मरुद्गणों-सहित मैं तुम्हें दीर्घायु, प्रदान करता हूं। तुम्हारा हर प्रकार से कल्याण हो। जहां तुम्हारी इच्छा हो, वहां तुम जाओ।’ मुनि ने प्रसन्न होकर समस्त देवताओं को पणाम किया और कहा, ‘देवगण ! यदि मुझे ब्राह्मणत्व और दीर्घायु प्राप्त हो गई है तो एकाक्षर ओंकार, वषट्कार और वेद मुझे इस रूप मे स्वीकार करें, और ब्रह्मा के पुत्र वशिष्ठ जो छात्र-वेद तथा ब्रह्म-वेद (क्षत्रिय और ब्राह्मण विधाओं के ज्ञाता) हैं, मुझे इस रूप