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स्पृश्य बनाम अस्पृश्य

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में संबोधित करें।’ देवताओं के अनुरोध पर वशिष्ठ ने विश्वामित्र के साथ संधि कर ली और उन्हें ब्रह्मर्षि होने का अधिकारी मान लिया।.... विश्वामित्र ने भी ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त कर वशिष्ठ को पूर्ण सम्मान दिया।

दूसरी घटना का संबंध क्षत्रियों द्वारा ब्राह्मणों की हत्या से है। उसका उल्लेख ‘महाभारत’ के ‘आदि पर्व’ में है। निम्न विवरण वहीं से उद्धृत हैः

एक बार कृतवीर्य नामक एक राजा थे। उनकी तपस्या से वेद-मर्मज्ञ भृगुवंशी जो उनके पुरोहित होते थे, धन-धान्य से आपूरित हो उठे। राजा के स्वर्गवासी होने पर उनके वंशजों को धन की जरूरत पड़ी। उन्होंने धनवान भृगुवंशियों से धन की याचना की। क्षत्रियों के डर से कुछ भृगुवंशियों ने अपना धन जमीन में गाड़ दिया, कुछ ने उसे ब्राह्मणों को दान दे दिया, पर कुछ अन्य ने क्षत्रियों को उनकी इच्छानुसार दिया। एक बार एक क्षत्रिय को भूमि खोदते समय एक भृगु के घर में कुछ धन गड़ा हुआ मिल गया। तब सभी क्षत्रिय एकत्र हुए और उन्होंने यह खजाना देखा। वह कुपित हो उठे। उन्हें भृगुवंश से घृणा हो गई। उन्होंने सभी भृगुवंशियों की, यहां तक कि जो गर्भस्थित शिशुओं के रूप में थे, उनकी भी हत्या कर दी। किसी तरह विधवाएं भागकर हिमालय पर्वत पर चली गईं। उनमें से एक ने अपना अजन्मा शिशु अपनी जंघा में छिपा लिया। एक ब्राह्मणी मुखबिर से क्षत्रियों को जब उस शिशु का पता चला तो उन्होंने उसी भी मार डालने का प्रयास किया, लेकिन वह अपार तेज-सहित अपनी माता की जंघा से पैदा हुआ और उसने हत्यारों को अंधा कर दिया। कुछ समय तक पर्वतों में विमूढ़ों की भांति भटकने के बाद उन्होंने विनयपूर्वक शिशु की माता से याचना की कि उनकी दृष्टि लौटा दी जाए। लेकिन माता ने कहा, ‘जाओ, मेरे अलौकिक पुत्र और्व के पास जाओ। उसके भीतर वेदव्यास-सहित संपूर्ण वेदों का वास है। उसी ने अपने संबंधियों की हत्या के प्रतिशोध में तुम्हारी दृष्टि का हरण कर लिया है। वही तुम्हारी दृष्टि को वापस कर सकता है।’ तद्नुसार वे उसकी शरण में गए और उनकी दृष्टि उन्हें पुनः वापस मिल गई। लेकिन और्व ने भृगुवंशियों की हत्या के प्रतिशोध में सभी चेतन प्राणियों के विनाश का निश्चय किया और उसके लिए तपस्या करने लगा। उससे सभी देव, असुर तथा मानव थर्रा उठे। लेकिन तभी उसके पितृगण स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने उससे तपस्या से विमुख होने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि वे नहीं चाहते कि क्षत्रियों से प्रतिशोध लिया जाए। उन्होंने कहा कि धर्ममाता भृगुवंशियों ने क्षत्रियों से उनके द्वारा की गई हत्या का प्रतिशोध किसी कमजोरी के कारण नहीं लिया था। जब हम बुढ़ापे से तंग आ गए, तो हमने स्वयं यह इच्छा की कि वे हमारी हत्या कर दें। उस भृगुवंशी के