4. स्पृश्य बनाम अस्पृश्य - Page 115

100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

घर में जिस किसी ने धन गाड़ दिया था, उसका प्रयोजन क्षत्रियों को भड़काना था। हम तो स्वर्ग की कामना कर रहे थे, हमें धन से क्या लेना-देना था? उन्होंने कहा कि उन्होंने यह युक्ति इसलिए अपनाई कि वे आत्महत्या का पाप मोल नहीं लेना चाहते थे। उन्होंने और्व से आग्रह किया कि वह अपने क्रोध पर नियंत्रण करे और उस पाप को न करे, जो वह अपने मन में संजोए हुए है। उन्होंने कहा, ‘वत्स ! क्षत्रियों का विनाश न करो। तीनों लोकों का भी विनाश न करो। अपनी उस क्रोधाग्नि को शांत करो, जो तपोबल को नष्ट कर देती है।’ लेकिन और्व ने उत्तर दिया, ‘मैं अपने निश्चय को अधूरा नहीं छोड़ सकता। मेरी क्रोधाग्नि यदि किसी वस्तु को भस्म नहीं करेगी तो वह मुझे ही भस्म कर देगी। वह उस दया-भावन का जिसकी उसके पितृगणों ने शिक्षा दी थी, न्याय, अनिवार्यता और कर्तव्य के आधार पर विरोध करता है।’ तब उसके पितृगणों ने उससे अनुरोध किया कि वह अपनी क्रोधाग्नि को समुद्र में फेंक दे, जहां वह जलतत्व को उद्वेलित करती रहेगी और इस प्रकार तुम्हारी प्रतिज्ञा भी पूर्ण हो जाएगी।

तीसरी घटना का संबंध ब्राह्मणें द्वारा क्षत्रियों की हत्या से है। ‘महाभारत’ में अनेक स्थानों पर इसकी कथा का उल्लेख हैः

प्राचीन-काल में सहस्र-भुजाओं वाला परम कांतिमान कार्तवीर्य नामक एक हैहयवंशी राजा समुद्र से घिरी समस्त पृथ्वी पर, जिस पर अनेक महासागर और महाद्वीप अवस्थित हैं, निष्कंटक राज्य करता था। वह माहिष्मती नगरी में रहता था। उसने मुनि दत्तात्रेय से ये वरदान प्राप्त किए थे कि जब कभी वह विश्व-विजय के लिए निकले, तब युद्ध में उसके एक सहस्र भुजाएं हों। वह न्यायपूर्ण शासन करे और जब कभी वह अपने कर्तव्य में धर्म से विरत होने लगे, तब मुनि उसका मार्गदर्शन करेंगे। तब वह सूर्य के समान दीप्तमान रथ पर आरुढ़ हो अभिमानपूर्वक बोला, ‘धैर्य, साहस, यश, शौर्य, पराक्रम, ऊर्जा और तेज मे मेरे समान कौन है?’ उसकी यह बात पूरी होते ही आकाशवाणी हुई, ‘मूर्ख, तुझे तो पता नहीं है कि ब्राह्मण क्षत्रिय से भी श्रेष्ठ होता है। ब्राह्मण की सहायता से ही क्षत्रिय इस लोक में प्रजा पर शासन करता है।’ अर्जुन ने उत्तर दिया, ‘मैं प्रसन्न होने पर प्राणियों की सृष्टि और कुपित होने पर उन सभी का नाश कर सकता हूं। मनसा, वाचा और कर्मणा कोई भी ब्राह्मण मुझसे श्रेष्ठ नहीं है। पहला कथन है कि ब्राह्मण क्षत्रियों से श्रेष्ठ हैंः दूसरा कथन कि क्षत्रिय क्षेष्ठ हैं, तुमने ये दोनों कथन उनके आधार पर कहे, लेकिन इन दोनों में (बल की दृष्टि से) अंतर है। ब्राह्मण क्षत्रियों पर निर्भर हैं, क्षत्रिय ब्राह्मणों पर निर्भर नहीं है। वे वेद को ब्याज बनाए हुए हैं। न्याय, अर्थात् जनता की रक्षा, क्षत्रिय में अवस्थित है।