स्पृश्य बनाम अस्पृश्य
101
ब्राह्मण उनसे जीविका पाते हैं, तब वे उनसे श्रेष्ठ किस प्रकार हो सकते हैं? मैं ब्राह्मणों को सदा अपने अधीन रखता हूं, जो सभी प्राणियों में प्रमुख हैं, जो भिक्षा पर जीवन यापन करते हैं, और जो अपने को श्रेष्ठ कहते हैं। चूंकि उस देवी गायत्री ने आकाशवाणी कर सत्य प्रकट कर दिया है, अतः मैं उन सभी दुर्विनीत ब्राह्मणों को अपने अधीन करूंगा, जिन्होंने मृगछाला पहल रखी है। तीनों लोकों में कोई भी देवता या मनुष्य मुझे राज-सिंहासन से नहीं हटा सकता। मैं प्रत्येक ब्राह्मण से श्रेष्ठ हूं। मैं उस विश्व को जिसमें ब्राह्मणों की श्रेष्ठता है, उस विश्व में बदल दूंगा जिसमें क्षत्रियों की श्रेष्ठता होगी, क्योंकि युद्ध में कोई भी मेरी शक्ति का सामना नहीं कर सकता।’ अर्जुन की इस वाणी की सुनकर वह देवी जो रात्रि में संचरण करती है, भयभीत हो गई। तब अंतरिक्ष में स्थित वायु ने अर्जुन से कहा, ‘इस कलुषित भाव को त्याग दो और ब्राह्मणों का आदर करो। यदि तुम उनको हानि पहुंचाओगे तो तुम्हारे राज्य में भयंकर उत्पात मच जाएगा। वे शक्तिशाली ब्राह्मण तुम्हें पराजित कर देंगे। वे तुम्हें तुम्हारे राज्य से निष्काषित कर देंगे।’ इस पर राजा ने पूछा, ‘आप कौन हैं?’ वायु ने उत्तर दिया, ‘राजन् मैं देवताओं का दूत वायु हूं और तुम्हें तुम्हारे हित की ही बात बता रहा हूं।’ अर्जुन ने कहा, ‘आपने यह कहकर ब्राह्मणों के प्रति प्रगाढ़ भक्ति का परिचय दिया है। लेकिन क्या ब्राह्मण पृथ्वी पर जन्में अन्य प्राणी के समान नहीं हैं?’
इस राजा का संघर्ष ब्रह्मर्षि जमदग्नि के पुत्र परशुराम से हुआ। इस संघर्ष की कथा इस प्रकार हैः
कभी गाधि नामक कान्यकुब्ज का राजा था। उसकी पुत्री सत्यवती थी। इस राजकुमारी का विवाह ट्टषि ट्टचीक से हुआ। उन्हीं के पुत्र जमदग्नि थे। जमदग्नि और रेणुका के पांच पुत्र थे। उनमें सबसे छोटे थे, दुर्जेय परशुराम। अपने पिता के आदेश से उन्होंने अपनी माता का वध किया, बुरी वासना के कारण जिसका सतीत्व भंग हो गया था। उनके चारों बड़े भाइयों ने माता की हत्या करने से इंकार कर दिया था और वे अपने पिता के शाप के कारण बुद्धि-भ्रष्ट हो गए। परशुराम के आग्रह पर उनके पिता ने उनकी माता को पुनः जीवित कर दिया और उनके भाइयों को पुनः बुद्धि प्रदान कर दी तथा उन्हें मातृ-हत्या के पास से मुक्त कर दिया। उनके पिता ने उन्हें वरदान दिया कि वह अजेय और दीर्घायु होंगे। कथा के अनुसार उनका पाला राजा अर्जुन (अथवा कार्तवीर्य) से पड़ा। कार्तवीर्य जमदग्नि के आश्रम पर आए। वहां मुनि की पत्नी ने उसका सादर स्वागत किया। लेकिन मुनि की यज्ञ-गौ (कामधेनु) के बछड़े बलात हरण और आश्रम के पेड़ों को नष्ट-भ्रष्ट कर उसने जब उस आदर का तिरस्कार किया। इस उत्पात का समाचार