4. स्पृश्य बनाम अस्पृश्य - Page 117

102 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पाकर परशुराम क्रोध से भर उठे। उन्होंने अर्जुन पर आक्रमण किया और उसकी

हजार भुजाओं को काट डाला तथा उसका वध कर दिया। उसके बाद प्रतिशोध

में अर्जुन के पुत्रों ने मुनि जमदग्नि की हत्या कर दी, जब वे ध्यानमग्न थे और

उनके पुत्र परशुराम उस समय वहां नहीं थे।

परशुराम ने अपने पिता की अंत्येष्टि करने के बाद प्रतिज्ञा की कि वह समूची

क्षत्रिय जाति को निर्मूल कर देंगे। अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार उन्होंने सबसे पहले

अर्जुन के पुत्रों और उनके अनुचरों को मार डाला। उन्होंने इक्कीस बार समूचे

भू-मंडल को क्षत्रिय-विहीन कर डाला। समंतपंचक में उन्होंने क्षत्रियों के रक्त से

पांच तालाबों का निर्माण किया। उनमें उन्होंने अपने पितरों का तर्पण करके उन्हें

तुष्ट किया। उन्होंने स्वयं अपने दादा ट्टचीक के दर्शन किए। ट्टचीक ने परशुराम

के साथ साक्षात बात की। परशुराम ने महान यज्ञ करके इंद्र को प्रसन्न किया और

यज्ञ के पुरोहितों को समस्त पृथ्वी दान में दे दी। उन्होंने अत्यंत तेजस्वी कश्यप

को बत्तीस हाथ ऊंची सोने की वेदिका भी दान में दे दी। महामुनि कश्यप की

अनुमति से यज्ञ के पुरोहितों ने भूमि आपस में बांट ली। इसके कारण इस क्षेत्र

का नाम खांडव वन पड़ गया। यज्ञभूमि आदि का दान कर परशुराम स्वयं महेंद्र

पर्वत चले गए। इस तरह उनके और क्षत्रियों के बीच वैर उपजा और असीम

शक्तिशाली परशुराम ने पृथ्वी को जीता।

परशुराम ने विभिन्न प्रदेशों के क्षत्रियों का वध किया। उनका वर्णन ‘महाभारत’ के ‘द्रोण पर्व’ में इस प्रकार किया गया है, यथा कश्मीर, दरद, कुंति, क्षुद्रक, मालव, अंग, वंग, कलिंग, विदेह, ताम्रलिप्तक, मार्तिकावत, शिवि तथा अनेक अन्य राजन्य।

जिस प्रकार क्षत्रिय जाति का पुनरुद्धार हुआ, उसकी चर्चा भी ब्राह्मणों के द्वारा क्षत्रियों के विनाश की कथा में इस प्रकार की गई हैः

इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियविहीन करने के बाद जमदग्नि के पुत्र परम

रमणीक महेंद्र पर्वत पर जाकर तप करने लगे। जब उन्होंने संसार से क्षत्रियों का

नाश कर दिया तो उनकी विधवाएं संतानोत्पत्ति की याचना से ब्राह्मणों के पास

गईं। इन धर्मनिष्ठ ब्राह्मणों ने वासना से मुक्त होकर उचित ट्टतुं में इन स्त्रियों

से समागम किया। इन स्त्रियों ने गर्भधारण किया और शूरवीर क्षत्रिय बालक एवं

बालिकाओं को जन्म दिया। इस प्रकार क्षत्रिय जाति का वंश चला। इन प्रकार

पवित्र भावना से क्षत्रिय महिलाओं के साथ ब्राह्मणों से समागम से क्षत्रिय जाति

की वृद्धि हुई और वह दीर्घ काल तक चलती रही। उसी से ब्राह्मणों से निम्न

स्तर की चार जातियां उत्पन्न हुईं।