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जातिप्रथा का अभिशाप

जैसा कि मैं प्रथम निबंध ख्1, में बता चुका हूं, कोई जाति एकल संख्या में नहीं हो सकती। जाति केवल बहुसंख्या में ही जिंदा रह सकती है। वास्तव में तो जाति समूह का विखंडन करके ही बनी रह सकती है। जाति की प्रकृति ही विखंडन और विभाजन करना है। जाति का यह अभिशाप भी है। लेकिन फिर भी कुछ लोग ही जानते हैं कि जाति का यह अभिशाप कितना बड़ा है। अतः यह आवश्यक है कि जाति द्वारा किए गए विखंडन की चर्चा करके इस अभिशाप की व्यापकता को दर्शाया जाए। यह तो असंभव है कि हर जाति की चर्चा की जाए और उसके विखंडन के क्रमिक प्रसार को दर्शाया जाए। किसी एक जाति कके जातीय इतिहास को प्रस्तुत करके ही हमें संतोष करना पड़ेगा। मैं ब्राह्मणों के इतिहास को ही लेता हूं। वे जातिप्रथा के प्रवर्तक और पक्षधर रहे हैं। इससे पता चल जाएगा कि वे स्वयं भी जाति के इस कथित अभिशाप से कितने अधिक ग्रस्त व त्रस्त हैं। भारत के ब्राह्मण भी दो अलग-अलग बिरादरियों में बंटे हुए हैं। एक बिरादरी द्रविड़ों की है, तो दूसरी गौड़ों की।

लेकिन भूलकर भी ऐसी कल्पना नहीं करनी चाहिए कि द्रविड़ों और गौड़ों की एकल समजातीय इकाइयां हैं। वे अनगिनत इकाइयों में विभाजित और उप-विभाजित हैं। उनकी संख्या का अनुमान तो तभी लगाया जा सकता है, जब उनके उप-विभाजनों की वास्तविक सूचियां हमारी आंखों के सामने हों। आगे के पृष्ठों में एक सूची प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, ताकि पता चल सके कि बिरादरी ही हर उप-शाखा कितनी जातियों और उप-जातियों में बंटी हुई है।

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द्रविड़ ब्राह्मण

द्रविड़ बिरादरी की पांच उप-शाखाएं हैं। उन्हें सामूहिक रूप से पंच-द्रविड़ कहा जाता है। उनकी पांच उप-शाखाएं हैंः

  1. देखिए, इस ग्रंथ-माला के खंड 1 में प्रकाशित ‘भारत में जातिप्रथा’ µ संपादक ।