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करोड़ों की आबादी को नकारने का प्रयास

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सन् 1911 की जनगणना के अवसर पर जनगणना में जाति के अनुसार गणना किए जाने पर और अधिक जोरदार तरीके से आपत्तियां उठाई गईं। उस समय दस कसौटियों वाली एक विशेष प्रश्नावली जारी की गई। उद्देश्य यह था कि इन कसौटियों को पूरा करने वाली जातियों का एक समूह बना दिया जाए। इसमें संदेह नहीं कि ये ऐसी कसौटियां थीं, जो दलित वर्गों की सवर्ण हिंदुओं से अलग करती थीं। सवर्ण हिंदुओं को आशंका थी कि यह परिपत्र भारत मंत्री (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) के नाम मुस्लिम ज्ञापन का नतीजा था और इसका उद्देश्य दलित वर्गों को हिंदुओं से अलग कर देना था, ताकि हिंदू समाज की संख्या और उसकी महत्ता को कम कर दिया जाए।

यह प्रतिरोध निष्फल रहा और उन दस कसौटियों को पूरा करने वाली जातियों की गणना जनसंख्या रिपोर्ट में अलग से करने के उद्देश्य को पूरा किया गया। लेकिन प्रतिरोध पूर्णतः शांत नहीं हुआ। 1921 की जनगणना के समय वह पुनः उभरा। इस अवसर पर औपचारिक रीति से जातीय विवरणी पर आपत्ति उठाने का प्रयास किया गया। 1920 में सम्राट की विधायिका (इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल) में एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। इसमें जाति संबंधी पूछताछ की आलोचना की गई। आलोचना के आधार थेः (क) जातिभेद की प्रथा को सरकारी प्रयास द्वारा मान्यता देना और बनाए रखना वांछनीय नहीं है, और (ख) विवरणियां गलत और व्यर्थ हैं, क्योंकि निम्न जातियों ने स्वयं को उच्चतर स्तर के समूहों के रूप में प्रदर्शित करने के अवसर का लाभ उठाया है। यदि यह प्रस्ताव पारित हो जाता है तो अस्पृश्यों की संख्या की जानकारी पाना संभव न हो पाता। सौभाग्य से प्रस्तावक की अनुपस्थिति के कारण प्रस्ताव पर चर्चा नहीं हुई और 1921 का जनगणना आयुक्त सामान्य रीति से अपनी जांच करने के लिए स्वतंत्र रहा।

तीसरे, 1921 से पहले किसी भी जनसंख्या आयुक्त ने अस्पृश्यों की अलग से गणना करने का कोई प्रयास नहीं किया। भारत में पहली बार आम जनगणना 1881 में हुई थी। 1881 की जनसंख्या रिपोर्ट में भारत की कुल जनगणना करने के लिए यहां की प्रजातियों की सूची बनाने और उनका कुल योग करने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया गया। इस रिपोर्ट में विभिन्न हिंदू जातियों का उच्च या निम्न अथवा स्पृश्य या अस्पृश्य जातियों के रूप में कोई वर्गीकरण नहीं किया गया। भारत की दूसरी आम जनगणना 1891 में हुई। इस जनगणना में पहली बार जनगणना आयुक्त ने जनसंख्या को जाति, प्रजाति और उच्च या निम्न जाति के रूप में वर्गीकृत करने की कोशिश की।

भारत की तीसरी आम जनगणना 1901 में हुई थी। इस जनगणना में वर्गीकरण का एक नया सिद्धांत अपनाया गया, अर्थात् ‘देशी जनमत द्वारा मान्य सामाजिक पूर्वता के