124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आधार पर वर्गीकरण।’ हिंदू समाज जैसे समाज के लिए यह सिद्धांत सर्वाधिक उपयुक्त सिद्धांत था, क्योंकि वह समता को स्वीकार नहीं करता और उसकी समाज-व्यवस्था उच्चतर तथा निम्नतर के श्रेणीकरण की व्यवस्था है। भारतीय जनता का जो विशाल वर्ग प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जाति के आधार पर संगठित है, उसके सामाजिक जीवन और समूहन का जितना सुस्पष्ट चित्र सामाजिक पूर्वता का यह सिद्धांत प्रस्तुत कर सकता है, उतना अन्य कोई नहीं कर सकता।
II
जनगणना आयुक्त ने स्पष्ट रूप से तथा समझ-बूझकर अस्पृश्यों की संख्या सुनिश्चित करने का प्रथम प्रयास 1911 में किया। 1911 की जनगणना से ठीक पहले का समय ऐसा था, जब मार्ले-मिंटो सुधार प्रारंभिक अवस्था में थे। यह वह समय था, जब भारत के मुसलमानों ने पृथक निर्वाचक-मंडलों के जरिए विधान-मंडलों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व पाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया था। अपने प्रचार के अंग के रूप में मुसलमानों का प्रतिनिधि-मंडल कौंसिल में तत्कालीन भारत मंत्री लार्ड मार्ले से मिला और उसने उन्हें 27 जनवरी, 1909 को एक ज्ञापन प्रस्तुत किया। उस ज्ञापन में कहा गया ... (बयान मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में दर्ज नहीं है µ संपादक)।
सन् 1907 में अस्पृश्यों के बारे में मुस्लिम प्रतिनिधि-मंडल ने अपने ज्ञापन में जो आग्रह किया, उसका कोई संबंध चार वर्ष बाद से अस्पृश्यों की अलग से गणना करने के जनगणना आयुक्त के विचार से है या नहीं, यह एक ऐसा मामला है, जिसके बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि जनसंख्या आयुक्त ने 1911 में जिस कार्य का प्रस्ताव रखा, वह केवल उन उपायों की चरम परिणति हो, जिन्हें उसके पूर्व के आयुक्तों ने जनसंख्या के अध्ययन के लिए अपनाया। जो भी हो, हिंदुओं ने उस समय भारी हंगामा किया, जब जनगणना आयुक्त ने अस्पृश्यों की अलग से गणना करने की अपनी योजना का एलान किया। ऐसा कहा गया है कि जनगणना आयुक्त का यह प्रयास उस साजिश का नतीजा था, जिसे हिंदू समाज में फूट डालने और उसे निर्बल बनाने के लिए मुसलमानों तथा अंग्रेजों ने रची थी। कहा गया कि इस प्रयास के पीछे यह सच्ची कामना नहीं थी कि अस्पृश्यों की संख्या मालूम की जाए, बल्कि यह कामना थी कि स्पृश्यों से अस्पृश्यों की संख्या को अलग करके हिंदू समाज की एकजुटता को भंग कर दिया जाए। हिंदुओं ने देश-भर में प्रतिरोध में अनेक सभाएं कीं और जनगणना आयुक्त की इस योजना की कठोरतम शब्दों में निंदा की।
तथापि, प्रतिरोध के इस तूफान से विचलित हुए बिना जनगणना आयुक्त ने अपनी योजना को पूरा करने का निश्चय किया। इसमें संदेह नहीं कि अस्पृश्यों की अलग से