करोड़ों की आबादी को नकारने का प्रयास
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गणना करने का जो तरीका उन्होंने अपनाया, वह अनोखा था। जनगणना आयुक्त ने विभिन्न प्रातों के जनगणना अधीक्षकों को अनुदेश दिया कि जिन जातियों तथा जनजातियों का वर्गीकरण हिंदुओं के रूप में किया गया है, पर जो कतिपय मापदंडों को पूरा नहीं करतीं अथवा जो कतिपय निर्योग्यताओं से ग्रस्त हैं, उनकी गणना अलग से की जाए।
इन कसौटियों के अनुसार जनगणना अधीक्षकों ने उन जातियां तथा जनजातियों की अलग से गणना कीः (1) जो ब्राह्मणों की श्रेष्ठता नहीं मानते, (2) जो किसी ब्राह्मण या अन्य मान्यता हिंदू से गुरु-दीक्षा नहीं लेते, (3) जो वेदों की सत्ता स्वीकार नहीं करते, (4) जो बड़े-बड़े हिंदू देवी-देवताओं की पूजा नहीं करते, (5) ब्राह्मण जिनकी यजमानी नहीं करते, (6) जिनका कोई ब्राह्मण पुरोहित बिल्कुल भी नहीं होता, (7) जो साधारण हिंदू मंदिरों के गर्भ-गृह में प्रवेश नहीं कर सकते, (8) जिनसे छूत लगती है, (9) जो अपने मुर्दों को दफनाते हैं, और (10) जो गोमांस खाते हैं, और गाय की पूजा नहीं करते।
जनगणना आयुक्त की छानबीन ने अटकल की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी। उन्होंने तथ्यतः यह मालूम कर लिया की अस्पृश्यों की आबादी कितनी थी। 1911 के जनगणना आयुक्त की खोज के अनुसार प्रांतवार अस्पृश्यों की संख्या निम्न सारणी में दशाई गई है ख्1, ः
प्रांत कुल आबादी दलित वर्गों की कुल दलित वर्गों
(दस लाख में) आबादी सीटें के लिए सीटें
(दस लाख में)
मद्रास 39.8 6.3 120 2
बंबई 19.5 0.6 113 1
बंगाल 45.0 9.9 127 1
संयुक्त प्रांत 47.0 10.1 120 1
पंजाब 19.5 1.7 85 -
बिहार तथा उड़ीसा 32.4 9.3 100 1
मध्य प्रदेश 12.0 3.7 72 1
असम 6.0 0.3 54 -
221.2 41.9 791 7
- यह सारणी इस ग्रंथ-माला के खंड 4, पृ. 75, से पुनः मुद्रित की गई है। मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में
यह दर्ज नहीं है µ संपादक।